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आलेख (जुलार्इ 2015)


  • कौरव-पांडव युद्ध : स्वार्थ, अभिमान और अन्याय की कहानी और श्रीकृष्ण की भूमिका
    कौरव-पांडव युद्ध : स्वार्थ, अभिमान और अन्याय
    की कहानी और श्रीकृष्ण की भूमिका


    कौरव और पांडव आपस में भार्इ-भार्इ थे। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे जो कौरव कहलाये। उनमें युवराज दुर्योधन सबसे बडे थे। धृतराष्ट्र हस्तिनापुर (वर्तमान दिल्ली) के राजा थे। उनके छोटे भार्इ पांडु के पांच पुत्र थे जो पांडव कहलाये। इनमें युधिष्ठिर सबसे बडे थे। जब कौरव-पांडवों में राज्य के विभाजन की बात आर्इ तो क्रूर-बुद्धि दुर्योधन ने पांडवों को हिस्सा देने से मना कर दिया। उस समय द्वापर युग था, अर्थात् कलियुग की अपेक्षा श्रेष्ठ लोग पृथ्वी पर मौजूद थे। किन्तु कौरव अपने पांडव भाइयों से शत्रुता रखते...
  • प्रेम का रहस्य -श्री श्याममनोहरजी महाराज, किशनगढ-पाली


    (औदीच्य समाज पुष्टिमार्गीय रहा है, कितु पुष्टिमार्ग अनुग्रह के साथ प्रेम का, अनन्य प्रेम का मार्ग है। हम केवल लेना चाहते हैं और यह चाहत प्रेम के मार्ग की सबसे बडी बाधा है, फिर र्इश्वरीय अनुग्रह और आनन्द की प्राप्ति कैसे सम्भव है। आइये श्याम मनोहरजी की बात पढें और गुने भी)

    आप चाहे कुँए के जल से या नल के जल से 'नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा' बोलकर श्री यमुनाजी की भावना से झारी भरते हैं, तो यमुनाजल आपकी झारी में आ सकता है। जिस समय आपने यमुनाजल...
  • त्रिपदा गायत्री एवं उसका शक्तिस्वरूप
    त्रिपदा गायत्री एवं उसका शक्तिस्वरूप

    -पं. कैलाशचंद्र दवे
    पूर्व प्राध्यापक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

    "न गायत्र्याः परो मन्त्रः" स्मृतिसमुय के उपर्युक्त कथनानुसार गायत्री मन्त्र से बढकर कोर्इ अन्य मन्त्र नहीं है। वेदाध्ययन के अधिकारी त्रैवर्णिकों में सर्वप्रथम अधिकारी ब्राह्म्ण के बालक का जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो उसमें आचार्य (गुरु) गायत्री मन्त्र का उपदेश करता है। गायत्री मन्त्र का उपदेश किस प्रकार करना चाहिए इस उपदेश-क्रम को पारस्करगृह्यसूत्र में निम्नलिखित रूप में बतलाया गया है-
    "पच्छोऽर्धर्चशः सर्वां च तृतीयेन सहाऽनुवर्तयेत्।" अर्थात् पहले त्रिपदा गायत्री के एक-एक पाद का, इसके बाद दूसरी बार आधी-आधी ॠचा-मन्त्र का तथा तीसरी बार समग्र गायत्री मन्त्र का उपदेश...
  • बुढापा अभिशाप नहीं
    बुढापा अभिशाप नहीं
    -कमलादेवी-राधेश्याम आचार्य

    बाल्यावस्था में माता-पिता बडे भार्इ-बहन, चाचा-चाची, बुआ आदि सब बालक का ध्यान रखते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में पुत्र-पुत्रियाँ, नाती-पोते सब दादा-दादी का ध्यान रखते हैं। वृद्धावस्था में बुद्धि अधिक स्थिर तथा परिपक्व होती है। प्रचुर ज्ञान तथा अनुभव का भण्डार होता है बुढापा।
    मनुष्य की युवावस्था धन सम्पत्ति अर्जित करने, घर के कार्यों को करने, उत्तरदायित्वों के निर्वहन के साथ मौज-मस्ती में व्यतीत हो जाती है।
    प्रौढावस्था भी शेष जिम्मेदारियाँ निभाने में चली जाती है। चैन की जिन्दगी वृद्धावस्था में ही उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर प्राप्त होती है। जो लोग वृद्धावस्था को आराम से व्यतीत करने की...
  • गीता का वास्तविक उद्देश्य व्यवहार एवं अध्यात्म का समन्वय है
    गीता का वास्तविक उद्देश्य
    व्यवहार एवं अध्यात्म का समन्वय है

    गीता में संपूर्ण मानव जाति के कल्याण का अमर संदेश है। गीता ने सदाचार को ही धर्म कहा है। सदाचार से ही त्याग जागृत होता है, और त्याग से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। भारत के महान संत रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि गीता का अर्थ समझना है तो 'गीता' इन दो शब्दों को उलटकर बोलो अर्थात् 'तागी' या 'त्यागी'। जो त्यागी है, वह ज्ञानी हो सकता है। परिवर्तन का दूसरा नाम ही समय है। संसार की हर वस्तु परिवर्तन से प्रभावित है। हर पल सब कुछ बदलता रहता...
  • महाभारत में पार्थ और कर्ण का चरित्र
    -प्रबोध पंड्या, उज्जैन
    हमारे धर्मशास्त्र मात्र हमें हमारे धर्म का ही ज्ञान देने वाले ग्रन्थ नहीं हैं, अपितु वे हमारे इतिहास ग्रन्थ भी हैं। हमारे महान् पूर्वजों ने धर्म व सत्यनिष्ठा के लिये जीवन पर्यन्त जो संघर्ष किया, उसका प्रामाणिक विवरण हमें इन्हीं ग्रन्थों में प्राप्त होता है। ऐसे महानायकों का जीवनवृत पठनीय, मननीय एवं अनुकरणीय है। इन महानायकों में सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र, भगवान् परशुराम,भगवान् दत्तात्रेय, भगवान् राम, भगवान् कृष्ण,प्रथम लौकिक काव्य के जनक महर्षि वाल्मीकि, इतिहास के पितामह श्री कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास अर्जुन, विदुर, चाणक्य,स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, हमारे दस गुरू, जगद्गुरू शंकराचार्य आदि अनेक आचार्यों दीर्घ परंपरा...