महाभारत में पार्थ और कर्ण का चरित्र

-प्रबोध पंड्या, उज्जैन
हमारे धर्मशास्त्र मात्र हमें हमारे धर्म का ही

ज्ञान देने वाले ग्रन्थ नहीं हैं, अपितु वे हमारे इतिहास ग्रन्थ भी हैं।

हमारे महान् पूर्वजों ने धर्म व सत्यनिष्ठा के लिये जीवन पर्यन्त जो संघर्ष

किया, उसका प्रामाणिक विवरण हमें इन्हीं ग्रन्थों में प्राप्त होता है।

ऐसे महानायकों का जीवनवृत पठनीय, मननीय एवं अनुकरणीय है। इन महानायकों में

सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र, भगवान् परशुराम,भगवान् दत्तात्रेय, भगवान् राम,

भगवान् कृष्ण,प्रथम लौकिक काव्य के जनक महर्षि वाल्मीकि, इतिहास के पितामह

श्री कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास अर्जुन, विदुर, चाणक्य,स्वामी विवेकानन्द,

महर्षि अरविन्द, हमारे दस गुरू, जगद्गुरू शंकराचार्य आदि अनेक आचार्यों

दीर्घ परंपरा मिलती है।
इन महानायकों ने जिन असामाजिक तत्त्वों से अथवा

असुरों से संघर्ष किया उनमें राक्षसी वृत्ति के जैसै रावण, कंस,दुर्योधन,

यवन, वाममार्गी, म्लेच्छ आदि हैं। वर्तमान में एक अनर्गल प्रलाप की

परम्परा चल पडी है कि इन असुरों में अच्छाइयाँ और नायकों में दोष देखने की

प्रक्रिया प्रचारित कर उनको महिमामण्डित किया जा रहा है । यही नहीं इस

प्रकार की धृष्टता करने वाले आर्य धर्म विरोधी स्वयं को विद्वान विश्लेषक

कहते हैं। उनके पास अपने इस अनर्गल प्रलाप के लिये कुछ वाक्य हैं कि

-देखिये जो सत्य है उसे नकारा नहीं जा सकता।
इन दुष्ट व असुरों की

प्रकृति वाले ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में कर्ण का नाम उपेक्षित शूरवीर के

रूप में जाना-माना है। कर्ण और अर्जुन इन दोनों के सन्दर्भ में सत्यासत्य

विवेक होना परमावश्यक है। पिछले कुछ दशकों से कर्ण के प्रति लोगों के ह्रदय

में बडी ही संवेदना उत्पन्न हो रही है कि अरे भार्इ उसकी माता ने उसे छोड

दिया, किन्तु उसकी माता कुन्ती है, राधा नहीं ये सत्य तो उसे महाभारत के

युद्ध के समय ज्ञात हुआ। उससे पूर्व तो उसे किसी ने यह नहीं बताया था। ऐसे

में उसके प्रति ये भाव कि अरे किसी अन्य ने उसे पाला कोर्इ महत्त्व ही नहीं

रखता।
कर्ण बडा होने पर शस्त्रेां के प्रति लालायित होता हुआ गुरूकुल

गया वहाँ कुलपति थे कृपाचार्य और उसके अनुकूल शिक्षा का प्रबन्ध हो गया।

किन्तु इसका हठ था कि वह द्रोणाचार्य से ही सीखेगा। ऐसा मन में विचार करके

यह द्रोणाचार्य के पास गया, किन्तु द्रोणाचार्य ने यह कहकर मना कर दिया कि

मेैंने मात्र राजपुत्रों को शिक्षा देने का वचन दिया है। उसका आर्थिक

प्रतिफल मुझे प्राप्त होता है, ऐसे में यदि मैं अपने ज्ञान को किसी अन्य को

दूँगा तो मेरा वचन मिथ्या हो जाता है। यही कारण था कि गुरू द्रौणाचार्य ने

एकलव्य, अश्र्वत्थामा को भी ब्रह्मस्त्र नहीं सिखाया।
कर्ण ने इसे अपना अपमान मान लिया तथा जीवन पर्यन्त द्रोणाचार्य का अपमान किया।
कर्ण

को वीर कहा गया है कि अरे वह वीर था उसके मन में स्त्रियों के प्रति बडा

ही सम्मान था,तो पाठकों को ये तथ्य बता दिया जाय कि द्यूत सभा में महासती

द्रौपदी को अपमानित करने का सुझाव इन्हीं वीर शिरोमणि का ही था। दुःशासन ने

दुर्योधन की ओर देखा उसकी अनुमति मिलते ही कुछ ऐसा हुआ कि भगवान् कृष्ण को

वहाँ प्रकट होना पडा।
इन वीर शिरोमणि ने अभिमन्यु को बालक समझ कर युद्ध

के लिये ललकार लिया, किन्तु ऐसी दुर्गति हुर्इ कि युद्ध के मैदान से भागना

पडा। अन्त में सभी सात योद्धाओं ने जिनमें शाप दग्ध अर्धरथी कर्ण, महारथी

दुर्योधन,महारथी दुःशासन, महारथी व सेनापति द्रोणाचार्य, महारथी,

अश्र्वत्थामा और महारथी कृतवर्मा थे, इन सभी ने मिलकर युद्ध किया उसमें भी

उससे जीत न सके। अन्त में दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण और अभिमन्यु का गदा

युद्ध प्रारम्भ हुआ्। तब भी जब लक्ष्मण युद्ध में सक्षम दिखार्इ देता तो

ठीक अन्यथा ये सातों उस पर बाण भी चला देते थे। इस प्रकार जब युद्ध

करते-करते दोनों मूच्र्िछत हो गये तो उसमें लक्ष्मण की मूच्छर पहले टूटी और

वो गदा लेकर प्रतीक्षा करने लगा कि अभिमन्यु उठे तो युद्ध करें, किन्तु

वहाँ भी दुर्योधन पुत्र लक्ष्मण को कर्ण ने सुझाव दिया कि इसको मूच्र्िछत

अवस्था में ही मार दो वरना ये उठ गया तो तुम्हें मार देगा। लक्ष्मण ने

तत्क्षण सुझाव मान लिया और अभिमन्यु के मस्तक पर गदा दे मारी। उसके बाद

दुःशासन से लात मार कर अभिमन्यु के शव को अपमानित किया।
अभिमन्यु के

प्रति इस वैर का कारण मात्र यही था कि महासती द्रौपदी के स्वयंवर के समय

अपनी हार से खिसयाए हुये ये सब अर्जुन से लडने लगें अर्जुन ने वहाँ पर ही

रखे बाणों को उठा कर युद्ध प्रारम्भ कर दिया। वहाँ कौरवों के साथ उस युद्ध

में कर्ण का बडा पुत्र भी था वह अर्जुन के एक बाण से यमलोक पहुँच गया।

इसमें अर्जुन का कोर्इ विशेष उद्देय नहीं था अपितु युद्ध था,अभ्यास नहीं

युद्ध में तो जो सामने आयेगा वह मारा जायेगा या मार देगा।
अब सबसे

महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि जब इन्द्र ने कर्ण को एक अस्त्र दिया कि इसे तुम

एक बार चला सकते हो ये अमोघ है, तो प्रश्र्न उठना स्वाभाविक है कि जब कोर्इ

अस्त्र यदि एक बार चलाया जा सकता है तो उसे दूसरी बार ,तीसरी बार क्यों

नहीं चलाया जा सकता और क्या अर्जुन के पास उसका कोर्इ प्रतिकार नहीं था।
इन

शंकाओं में पहले द्वितीय शंका का समाधान किया जाता है कि अर्जुन ने पूर्व

में ही संकल्प लिया था कि वह युद्ध के समय तक एक भी दिव्यास्त्र का प्रयोग

नहीं करेगा। ऐसे में अर्जुन कर्ण के द्वारा चलाये जाने वाले शस्त्र का

समाधान अथवा प्रतिकार का जानकार होते हुये भी उसका प्रतिकार नहीं कर सकता

था। इसीलिये कर्ण ने अपनी अमोघ शक्ति को सुरक्षित रखा था।
अश्र्वत्थामा

ने अपने जीवन में दो बार ब्रह्मस्त्र का प्रयोग किया एक बार युद्ध में

दूसरी बार युद्ध के समाप्त होने के बाद्। जब युद्ध में अश्र्वत्थामा ने

ब्रह्मस्त्र का प्रयोग किया उस समय योगिराज कृष्ण के कहने से अर्जुन समेत

सभी पाण्डवों और उनकी सेना ने शस्त्र नीचे रख कर हाथ जोड दिये परिणाम

स्वरूप ब्रह्मस्त्र शान्त हो गया। दुर्योधन बडा ही प्रसन्न हुआ कि ये कौनसा

अस्त्र था, अश्र्वत्थमा इसे पुनः चलाओ्। अश्र्चवत्थामा ने प्रत्युत्तर

दिया कि अब मैं दूसरी बार इसका प्रयोग युद्ध में नहीं कर सकूँगा क्योंकि

इन्होंने मेरे अस्त्र का सम्मान करके उसे समाप्त किया है। अब यदि मैंने

पुनः इसका संधान किया तो ये मुझे ही मार देगा। इसी अश्र्वत्थामा ने जब

युद्ध समाप्ति के बाद ब्रह्मस्त्र का प्रयोग किया तो योगीराज श्री कृष्ण के

कहने पर अर्जुन ने भी ब्रह्मस्त्र चलाया क्योंकि युद्ध समाप्ति के साथ ही

अर्जुन द्वारा दिव्यास्त्र प्रयोग न करने की प्रतिज्ञा भी समाप्त हो गर्इ

थी।
यही कारण था कि युद्ध के समय में भगवान् श्री कृष्ण ने कर्ण के

सामने घटोत्कच को ला खडा किया। परिणाम हुआ कि कर्ण ने विवश होकर घटोत्कच

पर वह शक्ति चलार्इ्।
अब प्रथम प्रश्र्न है कि कर्ण उस शक्ति का

द्वितीय बार उपयोग नहीं कर सकता तो क्योतो इसका समाधान है कि कर्ण ने उस

शक्ति को अपनी तपस्या से नहीं, अपितु इन्द्र द्वारा दी गर्इ शक्ति से उसे

धारण किया था। तथा इन्द्र द्वारा ही प्रदत्त शक्ति से ही वह उसका संधान कर

सकता था। इसके विपरीत यदि अर्जुन को देखा जाय तो उसने सारे दिव्यास्त्र

अपनी तपस्या,चारित्रिक सामथ्र्य, आत्मसंयम से प्राप्त किये थे। इसीलिये

उसमें सभी प्रकार दिव्यास्त्रों को धारण करने, संधान करने (चलाने) व उनका

प्रत्याहार (वापस लौटाने) का सामथ्र्य था। जो कि कर्ण में नहीं था। इसीलिये

अर्जुन कर्ण से श्रेष्ठ था।
आजकल यही प्रलाप हो रहा है कि कर्ण का कवच

उतरवा दिया, अरे भार्इ जो कवच उसने उतारा वो दिव्य था, जो कि उसने अपनी

योग्यता से नहीं अपितु जन्मजात प्राप्त किया था। किन्तु अर्जुन ने जिन

दिव्यास्त्रों का प्रयोग अपनी तपस्या, आत्मसंयम से सीखा उसका स्वयं त्याग

किया।
अर्जुन ने कहा कि जब युद्ध सामान्य मानव से है, तो दिव्यास्त्रों

के प्रयोग का कोर्इ औचित्य ही नही्ं। यही साधु असाधु की पहचान है कि जब

साधु होता है तो वह धर्म की अनुपालना स्वयं ही करता है जैसे अर्जुन ने की

और असाधु को धर्म पर लाने के लिये इन्द्रादि देवताओं को आना पडता है।
यदि

अर्जुन दिव्यास्त्रों का प्रयोग करता तो मात्र एक ही दिन में युद्ध समाप्त

कर सकता था, तब तो कर्ण की शक्ति भी व्यर्थ थी। कर्ण के कवच हटाने के बाद

वह सामान्य हुआ था कम नहीं ऐसे में वह अर्जुन के बराबर हुआ्। तथापि अर्जुन

उससे अधिक इसलिये प्रभावी था कि उसके भीतर व्याप्त दिव्यास्त्रों के तेज ने

उसके सामान्य बाणों में भी तेज भर दिया और जब उसने योग्यता होते हुये भी

उनका प्रयोग नहीं किया तो ये उसने मानवता का विशाल तप किया और शस्त्रों का

आशीर्वाद उसे प्राप्त हुआ्।
इस प्रकार ये अनर्गल प्रलाप आजकल होता है कि

कर्ण की तुलना अर्जुन से करते हुये अर्जुन को कर्ण से निम्नतर बताने का

प्रयास किया जाता है। मेरा यहाँ यही उद्देय है कि प्रत्येक सत्य को पढें और

जाने। इससे भारतीय इतिहास व धर्मशास्त्र के ग्रन्थों को विकृत करने और

उनके सत्य भावों को विकृत रूप में प्रकट करने का जो षडयन्त्र किया जा रहा

है, उसे समाप्त किया जाय।

Search