मैं दोषों का हिमगिरि बनकर आया हॅूं द्वारे

नरेश मेहता, अमला

मैं नतमस्तक गुरु चरणों में, गुरु मेरा भगवन
चाहे जग कितना ही मोहे, भ्रम में मत आना।
यह जग कांटो की बाडी है मग भी दुर्गम है
तन, मन, धन का मोह अडिग है, ये सब दुश्मन हैं
तुम पर मैं आश्रित हँू गुरुवर शरण तुम्हारी हूँ
तुम मत बिसराना
मैं दोषों का हिमगिरि बनकर आया हूँ द्वारे
मेरे भाग्य, दया पर तेरी, तुझपर ही वारे
तू ही पालक, रक्षक तू ही, तू ही पिता-मात-बंधु
तेरी दया और न कुछ चाहूँ सद्गुरु वर देना
तुम आनन्द के धाम हो गुरुवर 'धार' बसे आकर
श्रीलालजी पंड्याजी को अपना करना था चाकर
धन्य आपकी लीला, सच ही धन्य 'साहब' का तप
मैं बलिहारी जाऊँ दोनों पर दोनों कृपा करना

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