औदीच्य समाज ही नहीं राष्ट्र के गौरव

डॅा. रायबहादुर पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा 
जन्म-तत्कालीन सिरोही राज्य अंतर्गत "रोहिडा" ग्राम में संवत् १८२० भाद्रपद शुक्ल द्वितीया तद्नुसार १४ सितम्बर १८६३ 
पिता- हीराचन्द पीताम्बरजी ओझा
भार्इ-नन्दरामजी, भूरारामजी व ओंकारलालजी
संतान-रामेश्वरजी, राजेश्वरजी, बाल मुकुन्दजी व नानीबार्इ
शिक्षा-छः वर्ष की आयु में गाँव की पाठशाला में बिठाए एवं चौदह वर्ष की अवस्था तक जहॅां उन्होेंने गणित, हिन्दी एवं अंग्रेजी का अध्ययन किया। आठ वर्ष की आयु में शुक्ल-यजुर्वेद का अध्ययन करवाया गया। बालक गौरीशंकर की स्मरणशक्ति बहुत तीव्र थी। शुक्ल यजुर्वेद के चालीस अध्याय, चालीस दिनों में कन्ठस्थ कर अपने गुरु को सुनाये। १४ वर्ष की अवस्था में अपने भार्इ ओंकारजी के साथ बम्बर्इ गये। उन दिनों राजपूताने में रेल नहीं थी, अतः आपको अहमदाबाद तक १६० मील की यात्रा पैदल ही करनी पडी। बम्बर्इ पहुँचकर कुछ दिनों तक एक प्राइवेट स्कूल में गुजराती सीखी व बाद में गोकुलदास तेजपाल स्कूल में भर्ती हुए। वहॅां की पढार्इ के पश्चात् १७ वर्ष की आयु में आपने एलफिस्टन हार्इस्कूल में प्रवेश लिया। इन्हीं दिनों उन्होंने विद्यालक्ष्मी संस्कृत पाठशाला में संस्कृत एवं प्राकृत का अध्ययन भी किया। चूंकि भार्इ नन्दराम की स्थिति काफी तंग थी अतः वे समीपस्थ वागीश्वरी मंदिर की परिक्रमा लेते हुए तेल के दीपक में पढार्इ करते थे।

ओझाजी अपनी ज्ञानपिपासा की पूर्ति के लिए नेटिव जनरल लार्इब्रेरी के सदस्य बन गये। साथ ही रॅायल ऐशियाटिक लायब्रेरी में जाते थे। यहाँ से आपका इतिहास के प्रति रूझान बढा। सन् १८८५ में आपने मेटि्रक कर विल्सन कॅालेन में प्रवेश लिया। वहाँ अंगे्रजी, गणित व विज्ञान का अध्ययन किया एवं साथ ही श्रीमती गोडबोलेजी से संस्कृत पढते रहे। सन् १८८७ में परीक्षा के समय अस्वस्थ हो जाने के कारण वे इन्टरमीडियेट पूर्ण नहीं कर पाये और मातृभूमि लौटने पर विवश होना पडा। तीन माह के विश्राम के पश्चात् आप पुनः बम्बर्इ गये व वकालत की परीक्षा पास कर ली। किन्तु आपका रूझान इतिहास के प्रति था। अतः आप रॅायल ऐशियाटिक सोसायटी मे जाकर 'कर्नल टॅाड' द्वारा लिखित 'ऐनल्स एण्ड एन्टीक्विटीज अॅाफ राजस्थान' व 'ट्रेवल्स इनवेस्टीनी इण्डिया' पढी, जिससे आपकी राजस्थान का इतिहास जानने की अभिलाषा उत्कट हुर्इ। वहीं पर तत्कालीन लिपिशास्त्री व भारत विद्याविद् डॅा. भगवानलालजी इन्द्र से आपका परिचय हुआ, जिनसे लिपिशास्त्र व प्राचीन मुद्राओं का ज्ञान प्राप्त किया।

सन् १८८७ (प्रथम चैत्रविद संवत १९४४) को उदयपुर गये। वहाँ उनका कविराज श्यामलदासजी व पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्ड्या से परिचय हुआ। विद्वत्ता से प्रभावित होकर कविराज श्यामलदासजी ने उन्हें 'वीर विनोद' में सहायता हेतु इतिहास में सहायक मंत्री पद पर नियुक्ति दे दी। कुछ दिन पश्चात् इतिहास विभाग में सेक्रेटरी पद पर नियुक्ति हुर्इ व सन् १८८७ से १८९० तक वे उस पद पर कार्य करते रहे। सन् १८९० में उदयपुर में विक्टोरिया हॅाल की स्थापना हुर्इ व आप उसके प्रथम क्युरेटर (अध्यक्ष) बने। विक्टोरिया हॅाल में संग्रहीत प्राचीन मूर्तियाँ, अभिलेख आपके प्रयत्नों का फल हैं। उदयपुर में आपका परिचय प्रसिद्ध ज्योतिषी पंडित विनायक शास्त्री से हुआ। उनके संसर्ग से प्रभावित होकर उन्होंने सभी ग्रन्थ हिन्दी में लिखने का संकल्प लिया। सन् १८९४ में उन्होंने प्राचीन लिपि-माला ग्रन्थ की रचना की, जिससे प्रभावित होकर जर्मन विद्वान डॅा. बुलहर ने जर्मन भाषा में 'इंडिश पोलियोग्राफी' नामक ग्रन्थ की रचना की।

सन् १९०२ नवम्बर मास में वायसराय लॅाडर् कर्जन के उदयपुर आगमन पर उन्हें ऐतिहासिक स्थानों का भ्रमण करवाते रहे। ओझाजी के इतिहास व पुरातत्व के ज्ञान से प्रभावित होकर सन् १९०३ में दिल्ली दरबार मेें आपको विशेष रूप से आमंत्रित किया। इस निमंत्रण की विशेषता थी की मेवाड के २३५ सरदारों के लिए एक ही निमंत्रण पत्र था और ओझाजी के लिए अलग से निमंत्रण था। (यद्यपि उस समय आप मेवाड राज्य में कार्यरत थे।) सन् १९०७ तक आपकी सेवाएँ मेवाड को प्राप्त होती रही। सन् १९०८ में अजमेर में पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना हुर्इ। तब लॅाडर् मिन्टों ने उन्हें उदयपुर नरेश से अनुरोध कर अजमेर में क्यूरेटर (अध्यक्ष) पद पर नियुक्त किया। सन् १९०८ से १९३८ तक वे वहाँ कार्यरत रहे। सन् १९३७ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने इतिहास, पुरातत्व एवं हिन्दी साहित्य सेवा के सम्मानार्थ आपको डी. लिट. उपाधि से सम्मानित किया।

वहाँ ओझाजी का सम्पर्क आचार्य रामचन्द्र शुक्ल व बाबू श्यामसुन्दरदास से हुआ व उनके अनुरोध पर आपने काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका मेें लिखना आरम्भ किया। सन् १९११ में उनको पुनः दिल्ली दरबार में आमंत्रित किया गया व सन् १९१४ में उन्हें "रायबहादुर" की उपाधि से विभूषित किया गया। सन् १९१८ में उन्होंने प्राचीन लिपिमाला का संवर्धित संस्करण प्रकाशित किया। इसी ग्रन्थ पर सन् १९२४ र्इ. में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दिल्ली अधिवेशन में ओझाजी को "मंगलाप्रसाद पारितोषिक" से सम्मानित किया गया। सन् १९२० से लगातार तेरह वर्षों तक आप नागरी प्रचारिणी पत्रिका के संपादक भी रहे। सन् १९२४ से आपने राजपूताने का इतिहास लिखना प्रारंभ किया और इस क्रम में १२ पुस्तकें लिखी। इसी समय उन्होंने 'मुहणोत नेणसीरी ख्यात' व कल्हण की 'राजतरंगिणी' का विद्वत्तापूर्ण सम्पादन भी किया। सन् १९२८ में उन्हें 'महामहोपाध्याय' की उपाधि से विभूषित किया गया।

वे प्राचीन लिपियों के अतिरिक्त संस्कृत, गुजराती, प्राकृत, पाली, मागधी, अर्धमागधी, अपभं्रश, डिंगल, मराठी एवं अंग्रेजी भाषाओं के भी ज्ञाता थे। उन्होंने पाणिनि व्याकरण एवम् वेद-वेदांग के संदर्भों की ऐतिहासिक समीक्षा अपने ग्रन्थ 'प्राचीन लिपिमाला' की पाद टिप्पणियों में की है। उन्होंने अशोक की धर्म लिपियों का अध्ययन एवं संपादन भी किया। भारतवर्ष में प्रचलित लगभग ३३ संवतों का र्इस्वी सन् के परिप्रेक्ष्य में लेखन को व्यवस्थित किया।

सत्य के अनुसंधान व उसकी अविरत साधना व हिन्दी की सेवा (अंग्रेजों के काल में) से प्रभावित होकर सन् १९३४ में दिल्ली के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में ओझाजी सम्मानार्थ "भारतीय अनुशीलन ग्रन्थ" प्रकाशित कर उन्हें अर्पण किया गया। इस ग्रन्थ में हिन्दी, मराठी, बंगला, गुजराती, उिडया, असमिया, सिहली, मलयालम, फारसी, अंग्रेजी, जर्मन, अमेरिकन, फे्रन्च, ओलदेज, स्वीडिश एवमं रूसी विद्वानों ने अनुशीलनात्मक महत्वपूर्ण लेख दिये। यद्यपि वे प्रत्यक्षतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन से नहीं जुडे थे पर अप्रत्यक्ष रूप से वे इतिहास व संस्कृति के क्षेत्र में शुद्ध स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात कर चुके थे। बि्रटिश सरकार से सम्मानित भी हुए तो अपने राष्ट्र के इतिहास को उजागर करने के कारण। अंग्रेजी विद्वानों के संसर्ग में रहकर भी ओझाजी ने अपना सम्पूर्ण लेखन हिन्दी भाषा में किया। उस काल में जब अंग्रेजी भाषा का बोलबाला था और प्रायः अधिकांश स्तरीय प्रकाशन अंग्रेजी में ही होते थे, ओझाजी का हिन्दी में लेखन कार्य उनके मातृभाषा हिन्दी के प्रति अपूर्व प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना का परिचायक है। वे महान लेखक-शोधकर्त्ता व अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्तित्व थे, तथापि आप अपनी स्वज्ञाति के उत्थान के प्रति समय-समय पर अपना योगदान करते रहे। आपने तीर्थराज पुष्कर में अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का आयोजन किया व ज्ञाति विकास के लिये अपने विद्ववत्तापूर्ण विचारों को प्रकट किया। आप हमेशा व्यक्तिपेक्षा समाज को प्रधान मानते थे। आपकी आयु ८५ वर्ष भी हो गर्इ थी व कुछ वर्षों से वे दमा से पीिडत थे। १७ अप्रेल १९४७ र्इ. को, सिरोही के विश्वविश्रुत महामानव ने अपने पूर्वजों के ग्राम रोहिडा में वैकुंठवास किया। पं. गौरीशंकरजी ओझा पर प्रस्तुत सामग्री उनके पोते श्री राकेश ओझा द्वारा प्रेषित की गर्इ है।

Search