कौरव-पांडव युद्ध : स्वार्थ, अभिमान और अन्याय की कहानी और श्रीकृष्ण की भूमिका

कौरव-पांडव युद्ध : स्वार्थ, अभिमान और अन्याय
की कहानी और श्रीकृष्ण की भूमिका


कौरव
और पांडव आपस में भार्इ-भार्इ थे। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे जो कौरव
कहलाये। उनमें युवराज दुर्योधन सबसे बडे थे। धृतराष्ट्र हस्तिनापुर
(वर्तमान दिल्ली) के राजा थे। उनके छोटे भार्इ पांडु के पांच पुत्र थे जो
पांडव कहलाये। इनमें युधिष्ठिर सबसे बडे थे। जब कौरव-पांडवों में राज्य के
विभाजन की बात आर्इ तो क्रूर-बुद्धि दुर्योधन ने पांडवों को हिस्सा देने से
मना कर दिया। उस समय द्वापर युग था, अर्थात् कलियुग की अपेक्षा श्रेष्ठ
लोग पृथ्वी पर मौजूद थे। किन्तु कौरव अपने पांडव भाइयों से शत्रुता रखते
थे। ऐसी स्थिति में युद्ध को टालने के उद्देश्य से पांडवों की ओर से
श्रीकृष्ण समझौते का प्रस्ताव लेकर कौरवों की सभा में गये। उस समय कृष्ण
बहुत प्रभावशाली पुरुष थे। वे पांडवों के मित्र थे, किन्तु कौरवों के भी
हितैषी थे। कृष्ण यदुवंश के एक शक्तिशाली नेता, महान नीतिज्ञ, युद्ध-विशारद
और आदर्श गृहस्थ थे, साथ-साथ वे एक क्रांतदर्शी दार्शनिक और महान योगी भी
थे। एक ओर जहां राजा-महाराजाओं में उनकी प्रतिष्ठा थी, वहीं दूसरी ओर अपने
स्व-प्रदेश के भोले भाले ग्वालों और चरवाहों से भी उनका लगाव था। मानवता के
प्रति उनके हृदय में अगाध प्यार था। कृष्ण के एक सहपाठी थे सुदामा, जो अति
निर्धन थे। सुदामा की पत्नी ने बहुत पीछे पडकर उनको कृष्ण से मिलने
द्वारका के राजमहल भेजा। अपने बाल मित्र की भयंकर निर्धनताजनित दुर्दशा
देखकर कृष्ण की आँखों से आँसू झरने लगे व दौडकर उन्होंने सुदामा के धूल सने
नंगे पाँवों को सबके सामने अपने हाथों से धो डाला। उनमें इतनी करुणा थी कि
गाय के बछडे का कष्ट देखकर वे उसकी सहायता के लिए दौड पडते थे। द्वापर की
समाज-विरोधी शक्तियाँ, जिन्हें राक्षस कहते थे, कृष्ण के भय से काँपती थी।
कौरवों-पांडवों के बीच शांति स्थापित करने के उद्देश्य से उन्होंने
धृतराष्ट्र के दरबार में सिर्फ पाँच गाँव, पाँच पांडवों को देने का अत्यंत
विनम्र प्रस्ताव रखा। कितु दुर्योधन ने एक इंच भूमि भी देने से भी इंकार कर
दिया। मानवता के शुभचितक कृष्ण को खाली हाथ लौटना पडा और स्वार्थ, अभिमान व
अन्याय की कहानी आगे बढी। इस युद्ध का वर्णन उस युग के कवि-दार्शनिक कृष्ण
द्वैपायन व्यास ने अपने 'महाभारत' नामक ग्रंथ में किया है। इसी ग्रंथ में
गीता के उपदेशों का प्रसंग आया है, जो कृष्ण और अर्जुन के संवाद रूप में
है। -गोपालचंद्र जोशी, रतलाम
सेवानिवृत्त प्राचार्य


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