प्रेम का रहस्य -श्री श्याममनोहरजी महाराज, किशनगढ-पाली



(औदीच्य समाज पुष्टिमार्गीय रहा है, कितु पुष्टिमार्ग अनुग्रह के साथ प्रेम
का, अनन्य प्रेम का मार्ग है। हम केवल लेना चाहते हैं और यह चाहत प्रेम के
मार्ग की सबसे बडी बाधा है, फिर र्इश्वरीय अनुग्रह और आनन्द की प्राप्ति
कैसे सम्भव है। आइये श्याम मनोहरजी की बात पढें और गुने भी)



आप चाहे कुँए के जल से या नल के जल से 'नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं
मुदा' बोलकर श्री यमुनाजी की भावना से झारी भरते हैं, तो यमुनाजल आपकी झारी
में आ सकता है। जिस समय आपने यमुनाजल के भाव से झारी भरी, यमुनाजल के भाव
से स्नान कराया तब वह जल कुए का या नल का जल नहीं रह गया, यमुनाजल बन गया।
जैसे अखिल ब्रह्मण्ड का नायक आपके घर का ठाकुर बन कर आ रहा है, ऐसे ही
व्रजाधिप आपके घर में यमुनाजल से स्नान करने पधारेंगे। वह यमुनाजल जरा भी
न्यून नहीं है, यह बात साफ-साफ समझ लो।

ऐसे ही जो ॠतु आपको प्राप्त है,
जो तन आपको प्राप्त है, जो धन आपको प्राप्त है, जो परिवार आपको प्राप्त है,
उससे जब आप व्रज की भावना के साथ अपने ठाकुरजी की सेवा करेंगे, तो श्री
महाप्रभुजी आज्ञा करते हैं कि भक्त जहाँ भी भगवत्सेवा आरंभ कर देता है, वह
स्थल वैकुण्ठ बन जाता है। वहाँ रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति वैकुण्ठवासी बन
जाता है। वैकुण्ठवासी इस अर्थ में नहीं कि उसकी शोकसभा करनी पडे। 'वैकुण्ठ'
का बडा अच्छा अर्थ है 'जहाँ किसी तरह की कुण्ठा नहीं है, वह वैकुण्ठ है।'
जिनमें कुण्ठा है, हाय-हाय है, आज यह नहीं है, आज वह नहीं है, आज लड्डू
नहीं हैं, आज पूडी नहीं है, आज मनोरथी नहीं है, आज कोर्इ रसीद फाडनेवाला
नहीं है, ऐसे जो हाय-हाय करते हैं-वे सब कुण्ठावासी हैं, वैकुण्ठवासी नहीं।
पद्मनाभदासजी में किसी प्रकार की कुण्ठा नहीं थी। मथुराधीशजी उनके द्वारा
समर्पित छोलों का भोग आरोगने में प्रसन्न थे। जब वे अडेल गये तो श्री
महालक्ष्मी बहूजी ने उनके यहाँ सीधा भिजवाया। तब पद्मनाभदासजी में ठाकुरजी
मथुराधीशजी से यह पूछने का सामथ्र्य था कि आपको सीधे में आयी हुर्इ सामग्री
आरोगनी है या मेरे छोले आरोगने हैं मथुराधीशजी में भी ऐसी कोर्इ कुण्ठा
नहीं थी कि उन्हें छोले आरोग-आरोगकर कंटाला आ गया हो। मथुराधीशजी ने आज्ञा
की कि मुझे तो तेरे छोले ही भाते हैं।

पद्मनाभदासजी ने सोचा कि अब चिन्ता
किस बात की उन्होंने सीधा वापस श्री महालक्ष्मीजी के पास पहुँचा दिया और
निर्णय किया कि अपन अपने छोला ठाकुरजी को आरोगाने और महाप्रसाद लेने अपने
घर लौट चलो। श्री महाप्रभुजी ने भी श्री महालक्ष्मीजी से यही बात कही कि
पद्मनाभदास के घर आपने सीधा भेजा, इसी कारण वह चला गया अन्यथा वह नहीं
जाता। पद्मनाभदासजी के मन में ठाकुरजी के भोग में केवल छोले धरने में किसी
तरह की कुण्ठा नहीं थी। इसी प्रकार उनके ठाकुरजी में ऐसी कोर्इ कुण्ठा थी
कि यह मुझे केवल छोले ही भोग में धरता है। दोनों छोले में ही राजी थे। इसी
का नाम है वैकुण्ठवास।
हाय-हाय बूँदी नहीं आयी, मठरी नहीं आयी, मोहनथाल
नहीं आया, हाय-हाय, हाय-हाय... ये सब कुण्ठा है। इसी कारण हम वैकुण्ठवासी
नहीं हैं, कुण्ठावासी हैं। वैकुण्ठवासी वे हैं जो सहजता से जो उपलब्ध हो,
उससे सेवा करें'सहज प्रीति गोपालहि भावे।' पद्मनाभदासजी छोलों में ही सभी
सामग्री का भाव कर लेते थे कि प्रभु यह दाल आरोगिए, यह कढी आरोगिए, यह
भुजेना आरोगिए, यह मीठा भात आरोगिए, यह मोहनथाल आरोगिए। होते सब छोले ही
छोले। पर ठाकुरजी वैकुण्ठवासी हैं, इसलिए उन्हें छोले में मोहनथाल, बूँदी
का स्वाद आता था। छोले आरोग रहे हैं तब बूँदी, मोहनथाल का स्वाद कैसे आ
सकेगा ऐसी कुण्ठा न तो श्री मथुराधीशजी में थी और न पद्नाभदासजी में
क्योंकि वे दोनों वैकुण्ठ में वास करते हैं। अतः श्री महाप्रभुजी आज्ञा
करते हैं कि भक्त जहाँ भी भगवान् की सेवा शुरू कर देता है, वह स्थान
वैकुण्ठ बन जाता है। वह जिस वस्तु से भगवान् की सेवा करता है, वह वस्तु
वैकुण्ठ की वस्तु बन जाती है। उसमें से सारी कुण्ठाएँ निवृत्त हो जाती हैं।

श्री
महाप्रभुजी ने प्रेम का रहस्य समझाया है कि भगवान् का भक्त जहाँ भी भगवान्
की सेवा कर रहा है, वह स्थल वैकुण्ठ हो जाता है और भक्त जिस ॠतु में
भगवान् की सेवा कर रहा है, वह ॠतु वैकुण्ठ की ॠतु हो जाती है। यह
ॠतुक्रमसेवा का गंभीरतम रहस्य है। यह नहीं समझेंगे तो ॠतुक्रमसेवा में चूक
जाएँगे। पोथियों को पढ-पढकर बुद्धि थोथी हो जाएगी। पर यदि प्रेम के रहस्य
को, जो महाप्रभुजी ने समझाया है, समझेंगे तब न तो ॠतुक्रम की सेवा का क्रम
आपको अखरेगा और न उसमें कोर्इ विरोधाभास ही लगेगा।
पोथी पढ-पढ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढार्इ आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय।।

महाप्रभु ने प्रेम का रहस्य समझाया है। यदि महाप्रभुजी का राजमार्ग पकडेंगे तो यह रहस्य समझ में आ जाएगा।


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