त्रिपदा गायत्री एवं उसका शक्तिस्वरूप

त्रिपदा गायत्री एवं उसका शक्तिस्वरूप

-पं. कैलाशचंद्र दवे
पूर्व प्राध्यापक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

"न
गायत्र्याः परो मन्त्रः" स्मृतिसमुय के उपर्युक्त कथनानुसार गायत्री
मन्त्र से बढकर कोर्इ अन्य मन्त्र नहीं है। वेदाध्ययन के अधिकारी
त्रैवर्णिकों में सर्वप्रथम अधिकारी ब्राह्म्ण के बालक का जब यज्ञोपवीत
संस्कार होता है तो उसमें आचार्य (गुरु) गायत्री मन्त्र का उपदेश करता है।
गायत्री मन्त्र का उपदेश किस प्रकार करना चाहिए इस उपदेश-क्रम को
पारस्करगृह्यसूत्र में निम्नलिखित रूप में बतलाया गया है-
"पच्छोऽर्धर्चशः
सर्वां च तृतीयेन सहाऽनुवर्तयेत्।" अर्थात् पहले त्रिपदा गायत्री के एक-एक
पाद का, इसके बाद दूसरी बार आधी-आधी ॠचा-मन्त्र का तथा तीसरी बार समग्र
गायत्री मन्त्र का उपदेश करना चाहिए। यह उपदेश-क्रम श्रुति में भी
निर्दिष्ट है। यथा-तां वै पच्छोऽन्वाह। त्रयो वैः प्राणाः। प्राण उदानो
व्यानः। तानेवास्मिंस्तद्दधाति। अथार्द्धर्चशः। द्वौ वा इमौ प्राणौ।
प्राणोदानावेव। प्राणोदानावेवास्मिंस्तद्दधाति। अथ कृत्स्नाम्। एको वा अयं
प्राणः कृत्स्न उव। प्राणमेवास्तिंस्तकृत्स्नं दधाति।।"
अर्थात् एक-एक
पाद का एक- एक कर उपदेश करके गुरु-आचार्य शिष्य में प्राण, उदान एवं व्यान-
इन तीनों प्राणों-प्राणवायु का शिष्य में आधान करता है। आधी-आधी
ॠचा-मन्त्र का रुककर उपदेश देता हुआ गुरु प्राण एवं उदान-इन दोनों वायु का
शिष्य में आधान करता है।वायु की ऊध्र्व एवं अधः-नीचे की ओर गति के कारण
वृत्ति भेद से प्राणवायु के दो प्रकार होते हैं। तीसरी आवृत्ति में गुरु
समस्त-समग्र गायत्री का उपदेश कर समष्टिरूप मुख्य प्राण का शिष्य में आधान
करता है।
वस्तुतः गायत्री-शब्द का श्रुति के द्वारा साम्नात निर्वचन भी इसी प्राण-वायु से सम्बन्धित है। यथा-
"सा हैषा गयास्तत्रे। प्राणा वै गयाः। तत् प्राणान् तत्रे। तद्य यत् गयान्"
तत्रे। तस्मात् गायत्री नाम। स यामेवामूमन्वाहा एषैव सा। स यस्मा अन्वाह। तस्य प्राणान् त्रायते।
अर्थात्
जिस प्राणरूप गायत्री में सभी देवता एकत्वरूप से तथा सभी-चारों वेद, उन
वेदों में प्रतिपादित कर्म एवं उन तत्तत् कर्मों के फल समष्टिरूप से स्थित
हैं, वही गायत्री प्राणरूप में परिवर्तित होकर जगत् आत्मा-(जगदात्मा) वही
गायत्री प्राणों की एवं वागादि वृत्तियों की रक्षा करती है। अत एव
"गयास्तत्रे" यहाँ "गयत्राणात् गायत्री" गयान् अर्थात् प्राण, उदान, व्यान-
इन प्राणवृत्तियों की रक्षा-त्राण-इन अक्षरों के साम्य से गायत्री नाम
हुआ। अपान एवं समान दोनों प्राणवृत्तियों का उपर्युक्त प्राण, उदान, व्यान
में ही अन्तर्भाव है।
यद्यपि प्राणधारी जीव में ये उपर्युक्त सभी
प्राणवृत्तियाँ न्यूनाधिकरूप से रहती हैं, किन्तु त्रैवर्णिकों में
ब्राह्म्ण का धार्मिक एवं सामाजिक क्रिया-कलाप में सबसे बडा उत्तरदायित्व
रहता है। इस उत्तरदायित्व को मनु ने भी स्पष्ट कहा है-
एतद्देश प्रसूतस्य सकाशाद जन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवः।।
सामाजिक
व्यक्ति में यदि वृत्त या चरित्र नहीं है तो वह सब प्रकार से हीन एवं समाज
में गिरा हुआ होता है। नीतिशास्त्र में ऐसा ही कहा गया है-"वृत्ततस्तु हतो
हतः।"
ब्राह्म्ण-बालक के यज्ञोपवीत संस्कार से उनका दूसरा जन्म होता
है। अतएव उसको द्विज या द्विजन्मा कहा जाता है। गायत्री मन्त्र का विधिवत्
उपदेश करके गुरु-आचार्य उस शिष्य के प्राणों को महाप्राण तथा शक्ति-सम्पन्न
कर सुसंस्कृत बालक के शरीर में दिव्य ऊर्जा का संचार करता है।
गृह्यसूत्रादि ग्रन्थों में गर्भाधानादि संस्कारों से विधिवत् बालक का
संस्कार करने से वह समाज में सर्वो प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। बालक का जब
जात संस्कार होता है, उस समय भभ संस्कार कराने वाला आचार्य उत्पन्न बालक
में प्राणादि वृत्तियों को सशक्त करता है। यथा-"प्रतिदिशं पा
ब्राह्म्णानवस्थाप्य ब्रूयात्-इमं अनुप्राणितेति।"
अर्थात् हे
ब्राह्म्णों इस उत्पन्न कुमार को लक्ष्यकर आप सब इसको प्राणादि पाँच वायु
से युक्तकर दीर्घायु करें। संक्षिप्त प्रकार के अनुसार पूर्वादि चारों
दिशाओं में तथा एक ब्राह्म्ण मध्य में बैठकर कुमार को आयुष्मान् होने के
लिए प्राणादि पाँच प्रवृत्तियों से समन्त्रक आशीर्वाद देते हैं-
१. हे कुमार त्वं प्राण हृदि सुस्थः प्राणो भव।
२. हे कुमार सर्वाङ्गेषु व्यानो भव।
३. हे कुमार त्वं गुदे सुस्थोऽपानो भव।
४. हे कुमार त्वं कण्ठे सुस्थ उदानो भव।
५. हे कुमार त्वं नाभौ सुस्थः समानो भव।
इस
संस्कार के अन्त में "अश्मा भव परशुर्भव" इत्यादि मन्त्रपाठ पूर्वक आचार्य
कुमार का अभिमर्शन कर उसको पाषाण की तरह द्टढ एवं परशु (फरसे) की तरह
तीक्ष्ण बुद्धि वाला करता है। इस प्रकार सभी षोडश संस्कारों का मुख्य
उद्देश्य कुमार को सशक्त, चरित्रवान् एवं मेधावी करना होता है।
त्रिपदा
गायत्री मन्त्र के छन्द एवं उसके पाद का विवेचन भी आवश्यक है। छन्द शब्द से
तात्पर्य मन्त्र के श्लोक में अक्षरसंख्या है। पिङ्गल छन्दःसूत्र के
अनुसार "अष्टो वसवः" इस सूत्र में "वसु' शब्द गुरु एवं लघु संज्ञक आठ
अक्षरों का बोधक है। सामान्य रूप से वसु, बाण, रा, ॠषि इत्यादि प्रसिद्ध
पारिभाषिक शब्द संख्या का निर्देश करते हैं। जैसे-"वसु" शब्द ध्रुवादि
प्रभासान्त आठ वसुओं का वाचक है। इसी प्रकार "बाण" कामदेव के उन्मादन आदि
पाँच बाणों का, "रस" षड्रस -छः रस, एवं "ॠषि" सप्तर्षियों-सात ॠषियों का
वाक है।
गायत्री मन्त्र के तीनों पादों में आठ-आठ अक्षर हैं। तीनों
पादों की समग्र संख्या चौबीस (२४) होती है। इसीलिए
गायत्री-"चतुर्विंशत्यक्षरा" अर्थात् २४ अक्षरों वाली कही जाती है। इन २४
अक्षरों वाली कही जाती है। इन २४ अक्षरों में त् म् इन व्यञ्जन वर्णों की
गणना नहीं होती है। किसी भी मन्त्र में प्रतिपदोक्त प्रमाण को छोडकर ॐ
(प्रणव) की भी गणना नहीं होती। उदाहरण की द्टष्टि से नवार्णमन्त्र का जप ॐ
-प्रणव के साथ करते हैं। यदि नौ अक्षर वाले नवअर्णनवार्ण में प्रणव की गणना
करेंगे तो नवार्ण-नौ अक्षर न होकर दशार्ण-दस अक्षर होेंगे।
नवार्णमन्त्र-"ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विे"। इस नवार्णमन्त्र में नौ अक्षर
हैं। इसी प्रकार गायत्री मन्त्र में व्यंञ्जन वर्ण को छोडकर गिनती करने पर
२३ अक्षर ही होते हैं। गायत्री के २४ वें अक्षर की पूर्ति करने के लिए
पिङ्गल छन्दःसूत्र में "पाद"१ सूत्र के अधिकार में "इयादि पूरणः" अर्थात्
"इय्" आदि शब्द से "उव्" "पूर्वसवर्ण" का भी ग्रहण होता है। तात्पर्य यह है
कि जहाँ गायत्री आदि छन्दों के किसी पाद में यदि अक्षर संख्या कम हो ता उस
न्यून अक्षर की पूर्ति इय्, उव्-इ, उ-आदि अक्षरों से करनी चाहिए।
जैसे-"तत्सवितुर्परेणियम्" "दिवं गच्छ (स्वः) सुवः पत्त"। यहाँ आर्षी
गायत्री के प्रथम पाद-"तत्सवितुर्वरेण्यम्" में सात ही अक्षर हैं। यहाँ
"ण्य"में "इयादि पूरणः" से इ अक्षर से "णिय" दो स्वरवर्ण होने से पाद में
आठ-अक्षर हो जाते हैं। इस ऊह के सन्दर्भ में शौनक ने तथा
सर्वानुक्रमणिकाकार कात्यायन ने स्पष्ट उल्लेख किया है। यथा आह
शौनकः-व्यूहेदेकाक्षरी भावान् पादेषूनेषु संपदि' सम्पदैः) क्षैप्रवर्णांश्च
संयोगान् व्ययेयात्सद्टशैः पदैः। अर्थात् जहाँ क्षैप्र-यण्-सन्धि के संयोग
से यकार एवं वकार (य,व) वर्ण हो जाते हैं। यण् ही क्षिप्र (शीघ्र) होने से
क्षैप्र कहा गया है। जैसे-दध्यत्र (दधि अत्र) इत्यादि स्थलों में सन्धि एक
मात्रा को अविलम्ब अर्धमात्रा में कर देती है। पाणिनीय सूत्र "एकः पूर्व
परयोः" इस सूत्र के अधिकार में गुण, रपर, वृद्धि इत्यादि सन्धियाँ होती
हैं। उक्त सूत्र के अधिकार में यणादि सन्धि के द्वारा दो अक्षरों की सन्धि
को ही एकाक्षरीभाव कहा गया है।
"व्यूहेदेकाक्षरीभावान्" से यण् संयोग,
सवर्ण-दीर्घ, गुण एवं वृद्धि वाले स्थल में ही व्यूह के द्वारा पादपूर्ति
के अक्षर को बढाया जाता है। यथा-"पर्योज उद्भृतम्" "होता वरेण्य" दोनों
मन्त्रांश में यकार-य का "परियोजः, वरेणियः" व्यूहन होता है। "त्वमिन्द्र
वजि्रन्" में रकार-र का व्यूहन कर वजरिन् "अद्याद्य" में अद्य अद्य सवर्ण
का व्यूहन होता है।
गायत्री मन्त्र का जब विद्वान् आचार्य शिष्य को
उपदेश करता है तो उसी समय "पाठकाले वरेण्यं स्यात् जपकाले वरेणियम्।"
अर्थात् जब वेदपाठ या पारायणादि करने में गायत्री मन्त्र आवे तो वरेण्यम्
ही पाठ करना चाहिए। किन्तु संध्यावन्दन में गायत्री जप या अन्यत्र
पुरश्चरणादि में जप करना हो तो वहाँ वरेणियम् पद का ही उारण करने से
चतुर्विंशति (२४) अक्षर वाली त्रिपदा गायत्री होगी। वही गायत्री-जप द्विज
को जीवन में प्राणों की रक्षा कर अन्त में नरकादि पतन से भी उसकी रक्षा
करता है।
सर्वप्रथम गायत्री की वैदिक निर्वचन प्रक्रिया में प्राण, उदान
एवं व्यान-इन वायु-वृत्तियों वाले प्राणों को "गया वै प्राणाः" अर्थात्
प्राण ही "गयाः" के नाम से अभिहित हैं। इन गया वाचक प्राण, उदान एवं व्यान,
इन तीनों नामों के अक्षरों का व्यूह-अक्षरों का विश्लेषण ५-विच्छेद या
पृथक्करण करने पर आठ अक्षर होते हैं। त्रिपदा गायत्री प्रथम, द्वितीय एवं
तृतीय पाद की अक्षर संख्या भी आठ है।
इस प्रकार गायत्री के त्रयी लक्षण पद के सामञ्जस्य से भी गायत्री को प्राणों के साथ एकत्व है।
गायत्री
मन्त्र के देवता सविता (सूर्य) है। अदिति (देवमाता) से उत्पन्न होने से
इनको आदित्य कहा जाता है। सविता देवता संसार के सभी प्राणियों के प्रेरक
हैं। श्रौतकर्म में प्रायः सभी कर्म सविता की आज्ञा से ही होते हैं। शुक्ल
यजुर्वेद की माध्यन्दिनीय शाखा में देवस्य त्त्वा सवितुः प्रसवे अर्थात्
सविता देवता की प्रेरणा या उनकी अनुज्ञा होने पर मैं यह कर्म करता हँू।
उक्त मन्त्र का कर्इ बार पाठ समाम्नात है।
सविता, सूर्य या आदित्य से गायत्रभ के एकत्व को गायत्रभ के उपस्थान मन्त्र में स्पष्ट किया गया है। यथा-तस्या उपस्थानम्-
"ॐ गायत्रस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्य पद्यसि नहि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परो रजसे सावदोम्।"
उपर्युक्त
उपस्थान मन्त्र में प्रथम पंक्ति में "त्रिपदी" पद तक त्रिपदा गायत्री के
स्वरूप का विवेचन किया जा चुका है। शब्द लक्षणात्मिका इस त्रिपदा गायत्री
के तुरीय-चतुर्थ पद का ही मुख्यरूप से उपस्थान है। उपस्थान मन्त्र के
विनियोग से यह बात स्पष्ट होती है। उपस्थान-मन्त्र विनियोग।यथा-
तुरीयपदस्येति विमलॠषिः परमात्मा देवता गायत्री छन्दः, गायत्र्युपस्थाने विनियोगः।
इस
तुरीय (द्टष्टिगत) पद को श्रुति ही स्वयं स्पष्ट करती है। यथा- "अथास्याऽ
एतदेव तुरीयं दर्शनं पदं परो रजाः य एष तपति। यद्वै चतुर्थं तत्तुरीयम्।
दर्शतें पदमिति। दद्टश इव ह्येषः। परोरजा इति। सर्वमुह्येषु रज उपर्युपरि
तपति। एवं हैव श्रिया यशसा तपति। योऽस्या एतदेवं पदं वेद।"
अर्थात् इस
त्रिपदा शब्दलक्षणात्मिका गायत्री का यही तुरीय-चतुर्थ पद है, जो
आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुष है। मण्डलानतर्गत आदित्यरूप पुरुष सामने ही
द्टष्टिगत है, जो "परो रजाः" अर्थात् भूरादि सभी लोकों के ऊपर सत्यलोक में
स्थित होकर तपता है। जो चतुर्थ पद है, वही तुरीय है- "सूर्य आत्मा
जगतस्तस्थुषश्च" अर्थात् यह मण्डलवर्ती सूर्य इस चेतन एवं जडरूप समस्त जगत
का आत्मारूप है।
जो आँखों के सामने हैं अर्थात् प्रत्यक्ष है, वही सत्य है। इसी को श्रुति स्पष्ट करती है। यथा-
"सैषा
गायत्री एतस्मिन् तुरीये दर्शते पदे परो रजसि प्रतिष्ठिता। तद्वै तत्सत्ये
प्रतिष्ठिता। चक्षुर्वै सत्यम्। तस्माद्यदिदानीं द्वौ
विवदमानावेयातामहमद्राक्ष-महमश्रौषमिति। य एव ब्रूयादहमद्राक्षमिति। तस्मा
एव श्रद्दध्याम।"
अर्थात् यह त्रिपदा गायत्री उस तुरीय-चतुर्थ जो समस्त
लोकों के ऊपर जो कि आदित्यमण्डल के रूप में स्थित है, उसी सत्यलोक में
आदित्यपुरुष के साथ तादात्म्यरूप से मण्डल में स्थित सत्यरूप आदित्यपुरुष
प्रत्यक्ष है वही सत्य है। यदि इस समय इस बात को लेकर दो व्यक्ति परस्पर
विवाद में एक व्यक्ति यह कहे कि मैंने देखा है तथा दूसरा व्यक्ति कहे कि
मैंने सुना है तो ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति यह कहता है कि मैं देखा हँू तो
हम उस देखने वाले व्यक्ति पर ही श्रद्धापूर्वक विश्वास करते हैं। जो
व्यक्ति यह कहता है कि मैंनं सुना है तो हम उस पर विश्वास नहीं कर सकते।
क्योंकि सुनी हुर्इ बात का असत्य होना भी संभव है। अतः प्रत्यक्षरूप से जो
है, वही सत्य है। उस सत्य में ही गायत्री प्रतिष्ठित है।
तुरीयपद में
आश्रित सत्य का आधार बल है। "सत्यमेव जयते" यह जो प्रसिद्ध श्रुति है, इसका
तात्पर्य है कि सत्य ही अन्त मंें विजयी होता है। बल के बिना विजय की
प्राप्ति संभव नहीं। सत्य के साधक या उपासक को आत्मिक बल के बिना सिद्धि
प्राप्त नहीं होती। यह आत्मिक बल साधक के प्राणों में स्थित है। इसी बात को
निम्नांकित श्रुति स्पष्ट करती है-
"तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितम्।
प्राणो वै बलम्। तत्प्राणे प्रतिष्ठितम्। तस्मादाहुः-बलं सत्यादोजीय इति।
एवं उ एषा गायत्री अध्यात्मं प्रतिष्ठिता।"
उक्त श्रुति का निष्कर्ष यह
है कि आश्रित की अपेक्षा आश्रय अत्यन्त (ओजीय) बलवान् होता है। अतः प्राणों
को बलवान् एवं सुरक्षित करने के लिए श्रीविद्या के उपासक या दश महाविधाओं
में से किसी भी महाविद्या के साधक एवं उपासक के लिए सर्वप्रथम गायत्री की
उपासना नितान्त आवश्यक है। गायत्री की उपासना के बिना साधक को आत्मिक बल
प्राप्त होना कथमपि संभव नहीं है।
महाव्याहृतियों सहित गायत्री मन्त्र की व्याख्या
"ॐ
भूर्भवः स्वः" इन तीनों व्याहृतियों से प्रजापति ने क्रमशः भूमि,
अन्तरिक्ष, दिवम्, द्युलोक की सृष्टि की। इसी प्रकार प्रजापति ने इन
व्याहृतियों से अन्य और जो सृष्टि की, उसको श्रुति स्वयं कहती है। यथा
भूरिति
वै प्रजापति ब्रह्मजनयत, भुव इति क्षत्रम्, स्वरिति विशम्। भूरिति वै
प्रजापतिरात्मानमजनयत, भुव इति प्रजाम्, स्वरिति पशून्। एतावद्वा इदं
सर्वम्यावदात्मा-प्रजा-पशवः।
अर्थात् भूमि, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक, इन
तीनों लोकों की तीन व्याहृतियों के द्वारा सृष्टि के बाद प्रजापति ने भू
व्याहृति से ब्राह्म्ण जाति (वर्ण) की भुवः व्याहृति से क्षत्रिय जाति एवं
स्वः इस तृतीय व्याहृति से वैश्यजाति की सृष्टि की। तदनन्तर प्रजापति ने
भूः, भुवः, स्वः-इन तीनों व्याहृतियों से क्रमशः आत्मा, प्रजा एवं पशु वर्ग
की सृष्टि की। जीवात्मा जब तक अपने स्वरूप में अवस्थित रहता है तभी तक
इनके समस्त भोगसम्पादनयुक्त इस समग्र जगत् की स्थिति है। आत्मतत्त्व के
बिना इन प्रजा पशु आदि किसी की सत्ता नहीं रहती है।
अन्त में योगियाज्ञवल्क्योक्त कुछ श्लोक हैं-
तच्छब्देन तु यच्छब्दो बोधव्यः सततं बुधैः।
उदाहृते तु यच्छब्दे तच्छब्दः स्यादुदाहृतः।।१।।
सविता सर्वभूतानां सर्वभावान्प्रसूयते।
सवनात्पावनौव सविता तेन चोच्यते।।२।।
दीव्यते क्रीडते यस्मात् द्योतते रोचते दिवि।
तस्माद्देव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदेवतैः।।३।।
चिन्तयामो वयं भर्गं धियो यो नः प्रचोदयात्।
धर्मार्थकाममोक्षेक्षु बुद्धिवृत्तीः पुनः पुनः।।४।।
भ्रस्ज पाके भवेद्धातुर्यस्मात्पाचयते ह्यसौ।
भ्राजते दीप्यते यस्मागान्ते हरत्यपि।।५।।
कालािरूपमास्थाय सप्तार्िः सप्तरश्मिभिः।
भ्राजते यत्स्वरूपेण तस्माद्भर्गः स उच्यते।।६।।
भेति भीषयते लोकान् रेति रञ्जयेते प्रजाः।
गेत्यागच्छत्यजस्त्रं यो भगवान्भर्ग उच्यजते।।७।।
वरेण्यं वरणीयं च संसारभयभीरुभिः।
आदित्यान्तर्गतं य भर्गाख्यं वा मुमुक्षुभिः।।८।।
जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च।
ध्यानेन पुरुषो यस्तु द्रक्ष्यः स सूर्यमण्डले।।९।।
कहा गया है कि सृष्टि में भावों को उत्पन्न करने वाला सविता देव है। विकारात्मक भाव-
(१)
जायते-उत्पन्न होना, (२) अस्ति है या सत्ता (३) विपरिणमते-बदलता है, (४)
वर्द्धते-बढता है, (५) अपक्षीयते-घटता है, (६) विनश्यति-नष्ट हो जाता है।
ये उपर्युक्त छः भाव विकारात्मक भाव कहे गये हैं जो प्रायः समग्र जड-चेतन (स्थावर-जंगम) जगत् में व्याप्त हैं।
इन
उक्त भावों के अतिरिक्त सत्ता, स्वभाव, अभिप्राय एवं भिन्न-भिन्न चेष्टाएँ
आदि संसार के सभी भावों को उत्पन्न करने वाला या प्रेरित करने वाला सविता
देव ही है। प्रेरणार्थक "षू प्रेरणे" से सुवति स्वे-स्वे व्यापारे
प्राणिनः, इति सविता। अर्थात् सभी प्राणधारी जीवों को अपने-अपने
व्यापार-कर्म में प्रेरित करने वाला सविता देव ही होता है। सवन "अभिषव"
अर्थ को कहने वाली "षूञ् अभिषवे" सुनोतीति सविता।
सवन-प्रातः सवन,
माध्यन्दिन सवन एवं तृतीय सवन-इन तीनों सोमसवनों में सूक्ष्मरूप से हेतु
सविता ही हैं। सबको पावन-पवित्र करने वाला भी सविता है। अतएव
सविता सर्वभूतानां...सविता तेन चोच्यते।।२।।
दिव्यते क्रीडते...सर्वदेवतैः।।३।।
देवः-दानात्-दान
करने वाला या देने वाला, दीपनात्-दीपन करने वाला या कान्ति प्रदान करने
वाला, द्योतनात्-प्रकाश करने वाला, द्युस्थानः-द्युलोक-स्वर्ग में स्थित
रहने वाला देव होता है। इस सविता देवता की प्रेरणा से सब सांसारिक क्रीडा
होती है। अर्थात् यही देव क्रीडन करता है। अतिस्तुति की द्टष्टि से सभी देव
इसी सविता-आजानदेव-देव की स्तुति करते है। इसी कारण यह सविता देव है।
चिन्तयामो वयं भर्गं ...बुद्धिवृत्तीः पुनः पुनः।।४।।
हम
सब उस भर्ग-तेज का चिन्तन करते हैं, जो तेजोमय भर्गदेव (सूर्यनारायण)
धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षरूप चारों पुरुषार्थों को सम्पन्न करने हेतु
हमारी विभिन्न बुद्धिवृत्तियों को बार-बार प्रेरित करता है।
भ्रस्जपाके भवेद्धातुः ...जगान्ते हरत्यपि।।५।।
"भ्रस्जपाके"
पकाने अर्थवाली भ्रस्ज धातु से निष्पन्न यह भर्ग सबको परिपक्व करता है।
दीप्ति अर्थ वाली "भ्राजृदीप्तौ" धातु से निष्पन्न देदीप्यमान यह भर्ग
उपासक को तेजस्वी बनाता है। भर्जन अर्थ को कहने वाली "भृजी भर्जने" धातु से
निष्पन्न होने वाला यह भर्ग अन्त में जगत् का भर्जन-संहार भी करता है।
भगवान् शंकर का भी एक नाम भर्ग है। यही भर्ग हर के रूप में जगत् का हरण-नाश
करता है। अथवा यह सविता-सूर्य-देव सप्ताश्वरथ पर आरूढ होकर अपनी कालािरूप
सात रश्मियों-घातक किरणों से जगत् का हरण नाश करता है।
कालािरूपमा...तस्माद्भर्गः स उच्यते।।६।।
सात
घोडों वाले रथ पर आरूढ होकर यह सविता-सूर्य अपनी सात किरणों द्वारा
दैदीप्यमान् स्वरूप से जगमगाता है, इसलिए इस सविता-सूर्य के तेज को भर्ग
कहा जाता है।
भेति भीषयते लोकान्० ... भगवान् भर्ग उच्यते।।७।।
भर्ग
शब्द में "भ" वर्ण से कालािरूप में आकर लोकों को तपाकर भयभीत कर देता है।
"र" (रफ) वर्ण अत्यन्त शीतकाल में प्रजा को रंजित कर देता है। "ग" वर्ण से
यह सूर्य निरन्तर गमन चलता ही रहता है। अतः भगवान् भर्ग के नाम से व्यवहृत
होता है। भगवान् भास्कर न कभी उदित होते है न अस्त, निरन्तर गमन ही करते
रहते हैं। इसीलिए कहा गया है-नोदेति सविता नित्यं नान्तं याति कदाचन।
वरेण्यं वरणीयं च.... भर्गाख्यं वा मुमुक्षुभिः।।८।।
संसार
के भय से भयभीत मोक्ष की इच्छा वाले लोगों को आदित्यमण्डल में स्थित वरण
करने योग्य उस मुख्य-प्रधान भर्ग नामक सविता देव का वरण करना चाहिए।
जन्ममृत्यु विनाशाय... सूर्यमण्डले।।९।।
जन्म
एवं मृत्यु के विनाश हेतु तथा दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीन प्रकार के
दुःखों से मुक्त होने के लिए दुःखी मनुष्य को सूर्यमण्डल में स्थित
प्रत्यक्ष दर्शनीय "पुरुषान्न परं किाति्" इस श्रुति प्रतिपादित पुरुष की
ध्यानपूर्वक आराधना करनी चाहिए।
कात्यायन परिशिष्ट के अनुसार गायत्री मन्त्र के वर्णदेवता भी २४ हैं। वर्णक्रमानुसार निम्नाङि्कत श्लोक है-योगियाज्ञवल्क्य ः-
अक्षराणां तु दैवत्य सम्प्रवक्ष्याम्यतः परम्।
आग्नेयं प्रथमं ज्ञेयं वायव्या द्वितीयकम्।।
तृतीयं सूर्यदैवत्यं चतुर्थ वैद्युतं तथा।
पामं यमदैवत्यं वारुण्यं षष्ठमुच्यते।।
बार्हस्पत्यं सप्तम तु पर्जन्यमष्टमं विदुः।
ऐन्द्रं तु नवमं ज्ञेयं गान्धर्वं दशमं तथा।।
पौष्णमेकादशं प्रोक्तं मैत्रावरुण द्वादशम्।
त्वाष्ट्रं त्रयोदशं ज्ञेयं वासवं तु चतुर्दशम्।।
मारुतं पादशकं सौम्यं षोडशकं स्मृतम्।
सप्तदशं त्वांगिरसं वैशृवदेवमतः परम्।।
आश्विनं चैकोनविशं प्राजापत्यं तु विशकम्।
सर्वदेवमयं प्रोक्तमेकविशमतः परम्।।
रौद्रं द्वाविशकं प्रोक्तं त्रयोविशि तु ब्राह्म्कम्।
वैष्णवं तु चतुर्विंशमेताह्यक्षर देवताः।।
निम्नांकित तालिका से मन्त्रवर्ण एवं उनके देवता को ठीक से समझ सकते हैं -
मन्त्रवर्ण देवता मन्त्रवर्ण देवता
१. तत् अग्नि १३. स्यं त्वष्टा
२. स वायु १४. धी वसु
३. वि सूर्य १५. म मरुत्
४. तुर् विद्युत् १६. हि. सोम
५. व यम १७. धि आङ्गिरस
६. रे वरुण १८. यः (यो) विश्वेदेवा
७. णि बृहस्पति १९. यः (यो) आश्विन (यो)
८. यम् पर्जन्य २०. नः प्रजापति
९. भ इन्द्र २१. प्र सर्वदेव
१०. र्गः (र्गो) गन्धर्व) २२. चो रुद्र
११. दे पूषा २३. द ब्रह्म्
१२. व मैत्रावरुण २४. यात् विष्णु
गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।
गायत्र्यास्तु परं नाऽस्ति दिवि चेह च पावनम्।
गायन्तं त्रायते यस्माद्गायत्री तेन सोच्यते।
अर्थात्
गायत्री वेदों की माता है। यह पापों का नाश करने वाली है। इस लोक में या
परलोक में गायत्री से उत्तम पवित्र करने वाला कोर्इ मन्त्र नहीं है।
गायत्री का गान-जप या आराधना करने वाले व्यक्ति को यह गायत्री रक्षा करती है।
गायत्री जपविधि ः
ॐकांर पूर्वमुार्य भूर्भुवः स्वस्तथैव च।
गायत्री प्रणवश्चान्ते जप एवमुदाहृतः।।
प्रातर्नाभौ करं कृत्वा मध्याह्ने हृदि संस्िथतम्।
सायं जपेच्च नासाग्रे ह्येष जपविधिः स्मृतः।।
अर्थात्
गायत्री मन्त्र के जप में सबसे पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण करने के बाद
"भूर्भुवः स्वः" इन व्याहृतियों का उच्चारण करके गायत्री मन्त्र के अन्त
में पनः प्रणव का उच्चारण करना चाहिए।
इस प्रकार प्रणव से सम्मुपट
चतुर्विंशति-चौबीस अक्षरों वाली गायत्री का जप करने से ही साधक को सिद्धि
एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रातः मध्याह्न एवं सायाह्न में क्रमशः
जप-मालिका में हाथ की स्थिति-प्रातः नाभि के सामने, मध्याह्न (दोपहर) में
हृदय के सामने एवं सायं नासिका (नाक) के सामने होनी चाहिए।

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