भालू चढ गया पहाड पर

अज्ञेय की रचनाओं मे उपस्थित छोटे-छोटे घटना-प्रसंग हमें भारतीय होने की
याद दिलाते हैं। भारतीय आचार-विचार पर गर्व और मान की भावना से पूरते हैं।
साथ ही हमारे समय और व्यवस्था के मनोविज्ञान की सटीक समीक्षा बडी शालीनता
और खूबसूरती से करते हैं। तो, आइये अज्ञेय की एक रचना 'भालू चढ गया पहाड
पर' पढें और इस निबंध में व्यक्त आम भारतीय के सोच और उसकी मानसिकता के साथ
सत्ता की अर्थ-केन्दि्रत चारित्रिक विडम्बनाओं पर एक नजर डालें तथा समय के
आर्इने में खुद को देखने-पहचानने के साथ आत्ममूल्यांकन करें। शायद हमें
निहाल कर देने वाला रोशनी का कोर्इ टुकडा नजर आ जाए।

अभी उस दिन मेरे
परिचित नौजवान दंपति मिलने आये थे। साथ उनकी छोटी लडकी थी, जिसे कुछ महीने
पहले किडरगाडर्न में भर्ती कराया गया था। 'डैडी जी' और 'ममी जी' को इस बात
का बडा गर्व था कि स्कूल में 'बेबी जी' ने कर्इ गाने सीख लिये हैं। और घरों
में भी यह संदर्भ उठता ही होगा और तुरंत बेबी जी को गाना सुनाने को कहा
जाता होगा मेरे सामने भी कहा गया और बेबी जी ने बडी अदा से अंग्रेजी के दो
तीन 'गाने' भी सुना दिये-सभी मध्यवर्गीय डैडियों-ममियों ने सुन रखे
होंगे-'बा बा ब्लैक शीप', टिकल्स बेल, आदि।
मैंने पूछा, 'कोर्इ हिदी गाना भी आता है-स्कूल में बिलकुल नहीं सिखाते'
थोडे
से असमंजस के बाद ममी जी ने बेबी को याद दिलाया,'बेटा, वह सुना दे भालू
वाला-'और थोडे निहोरे के बाद बेबी जी ने सुना भी दिया। अंग्रेजी पद्धति के
जिन शिशु विहारों में कुछ न कुछ हिदी में सिखाना भी जरूरी हो जाता है, उन
में दो-चार अंग्रेजी बालगीतों के हिदी रूपांतर चले हुए हैं-उन्हीं में से
एक ः
मैंने बेबी जी की अपेक्षित संस्तुति की थोडी देर बाद डैडी जी-ममी जी विदा ले कर चले गये। पहाड पर चढता भालू मेरे पास रह गया।
आज
उसी भालू की याद आ रही है। पहाडों का सीजन शुरू हो गया है- सभी पहाड की और
दौडे जा रहे हैं। एक जमाना था, जब थोडे से लोग दिल्ली-शिमला 'करते' थे, तब
'पहाड जाने' का इतना चलन नहीं था, पर दिल्ली-शिमला करने वालों का, और कुछ
अन्य पहाडी स्टेशनों की ओर दौडने वाले साहबों और खास कर मेम साहबों (और उन
के कुत्तों) का अमला भी साथ जाता ही था। अब वे साहब तो रहे ही नहीं, उनका
स्थान लेने वाले जो देशी बडे साहब आये हैं, वे तो बारी-बारी से एक-एक पहाडी
स्थल पर कोर्इ न कोर्इ 'जरूरी' सरकारी मीटिग या सेमिनार आदि रख लेते हैं,
जिससे ठंडी जगह त.फरीह का उद्देश्य भी पूरा हो जाये, निजी प्रबंध भी न करना
पडे और सि.र्फ र्चा ही बच जाये, बल्कि कुछ खरीददारी के लिए भत्ता भी बन
जाये। फिर जो .गैरसरकारी अमीर लोग हैं, वे भी अब पहाड नहीं जाते, अपने शहर
में या शहर के बाहर '.फार्म' में वातानुकूलित घरों में गर्मियां बिताते
हैं। जिन्हें न चलना-फिरना है, न शरीर को व्यायाम का ही कष्ट देना है, न
प्रकृति से कोर्इ प्रयोजन है, उन्हें पहाड से क्या लेना-देना कभी कभार मोटर
में बैठ कर वीक एंड पाटर्ी के लिए कहीं हो आना दूसरी बात हैं ं ंं ं
लेकिन
फिर भी मैंने लिख दिया कि 'सभी पहाड की ओर दौडे जा रहे हैं।' ये 'सभी' कौन
हैं न तो बडे साहब अब पहाड को दौडते हैं, न बडे सेठ धनी, और जो .गरीब लोग
हैं उनके जाने का तो सवाल ही कहां उठता है। तो ये 'सभी' वास्तव में वे लोग
हैं, जिन्हें हिदी का कहानी लेखक 'आम आदमी' कहता है-मध्यवर्गीय,
मध्यवित्तीय शहरी लोग, छोटे व्यापारी, छोटे अ.फसर और उनके परिवार, ठेकेदार
और मौसमी दुकानदार, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी और नवस्नातक, और हां,
इन्हीं वर्गों और श्रेणियों के नवविवाहित ं ं ंं नवविवाहितों का पहाडी
स्टेशनों से-पहाडों से नहीं, केवल स्टेशनों से-एक व्यापक नया रिश्ता बन गया
है। यहां तक कि पहाडों में अब एक अलग हनीमून सीजन की चर्चा होने लगी है,
जिस का हालिडे सी.जन से सीधा संबंध नहीं है। घोषित अथवा अघोषित रूप से भारत
के मध्यवर्ग ने 'हनीमून' की प्रथा भी अपना ली है, जैसे कि उसने इससे पहले
अनेक अजीबो.गरीब विदेशी रस्म-रिवाज भी अपना लिये हैं, जिन्हें अब वह विवाह
की 'सनातन परंपरा' का अंग मानता है।
तो ये ही लोग हैं वे 'सभी', जो पहाड
दौडे जा रहे हैं। क्यों दौडे जा रहे हैं, इस का जवाब सोचने के लिए रुकने
का समय नहीं हैं-रुके और कहीं पीछे छूट गये तो फिर टिकट भी नहीं मिलेगा-और
गर्मियों के बाद लोग जब लौट कर अपनी रंगरेलियों की चर्चा करेंगे, तो जवाब
में कहने को भी कुछ नहीं मिलेगा ं ं ं इस लिए- चलो पहाड ं ं ंं
यों,
भालू चढ रहा है पहाड पर-कि देखें कुछ वहां। उस बेचारे को क्या मालूम कि
वहां से उसे कुछ नहीं मिलेगा। यह जो ठेलमठेल भीड पहाड को चली जा रही है इस
लिए कि और भी 'सब' जा रहे हैं और पहले बडे आदमी जाते थे, इसलिए पहाड जाना
बडे आदमी होना है-क्या उसे मालूम है कि आज पहाड पर पीने का पानी तक नहीं है
रोशनी को बिजली नहीं हैं, सिवा काले बा.जार के कहीं मिट्टी का तेल नहीं है
और तो और, जिन पहाडी स्थलों की शोभा ही वहां का पानी माना जाता था-जैसे
नैनीताल-वहां पीने के पानी का यह हाल है कि ऊंची जगहों के लिए पानी मोटर
में या खरों पर लाद कर ले जाया जा रहा है, नीची जगहों पर कभी-कभी जो पानी
नलों में आता है, उसके लिए मार-मार होती है और बहरहाल सैलानी की तो पहुंच
उस तक होती ही नहीं ं ं बा.की नीचे के होटलो में एक तसल्लीबश झूठ का
प्रचार कर दिया गया है कि पानी ऊंचार्इ पर नहीं चढता, पर नीचे के नलों में
रात में आ जाता है-और इस झूठ से आश्वस्त लोगों के लिए रातोंरात ताल से ही
बाल्टियां भर भर कर पानी पहुंचाया जाता है- अधिकतर तल्लीताल का पानी जो
पीने के लिए अनुपयुक्त ही नहीं, तरनाक है ं ं ं
पानी क्यों नहीं आता
'क्योंकि बिजली नहीं है, पंप नहीं चलते, पानी ऊपर नहीं चढाया जा सकता।
'बिजली क्यों नहीं है' क्योंकि पानी नहीं है-देश में ही पानी का संकट है,
उत्तर प्रदेश में तो ास तौर से-पनबिजली की सारी व्यवस्थाएं बेकार पडी है।'
पानी
नहीं, क्योंकि बिजली नहीं बिजली नहीं, क्योंकि पानी नहीं। अब बोलिए, इस
गोल दलील से बच कर कहां जाएंगे हठ कर के पूछिए, शायद थोडा और सच सामने आये :
पानी-बिजली दोनों क्यों नहीं है क्योंकि ऊपर पहाडों पर सब जगह जंगल काट
दिये गये हैं-पानी आये तो आये कहां से वर्षा होगी तो बाढ आ जाएगी, क्योंकि
पानी को रोकने और संचित करने वाले ऊंचे सदाबहार पेड और बांज के पेड तो सब
काटे जा रहे हैं, और वर्षा नहीं होगी तो ं ं ं नदी-नाले, सोते-नाले सब यों
ही सूख रहे हैं, क्योंकि ऊपर जंगलों में और पेडों की जडोे, छोटे पौधों और
झरे पत्तों में रुक कर पानी भूमि में रचेगा नहीं तो सोते और नाले कहां से
भरेंगे
असल बात यह है। इस पर बेचारे भालू का कोर्इ बस नहीं है। बिजली
नहीं है, क्योंकि पानी नहीं है, पानी नहीं है और नहीं होगा, क्योंकि ऊंचे
जंगल सा.फ किये जा रहे हैं। ठेकेदारों के बेटे हनीमून के लिए पहाड पर जा
रहे हैं, पर ठेकेदार ुद ऊपरी पहाडों पर और पेड कटवा रहे हैं।
पर जंगल तो
'राष्ट्रीय संपत्ति' है, 'हरा सोना' है फिर पेड क्यों इतनी हृदयहीनता से
काटे जा रहे हैं और नये पेडों की रोपनी भी तो होती होगी।
जी हां। पर
आपने सुना होगा, पानी को भी 'राष्ट्रीय संपत्ति' घोषित कर दिया गया है।
उससे आपको मिलने लगेगा, ऐसा थोडे ही है हम-आप तो सोच सकते हैं कि किसी
वस्तु को राष्ट्रीय संपदा घोषित करने के दो अर्थ हैं-एक तो उसकी सुरक्षा और
संवृद्धि की .िजम्मेवारी दूसरे, उसके व्यापक और उचित वितरण की व्यवस्था
अर्थात् पानी अगर राष्ट्रीय संपदा है, तो वह हम सबको समान रूप से सुलभ होना
चाहिए और उसके संचय और संवर्द्धन की भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वह
हमको मिलता रहे। पर सरकारें और प्रशासन व्यवस्थाएं ऐसा सोचती नहीं जान
पडतीं। उनके सामने केवल एक बात है। वे लोग 'राष्ट्रीय संपदा' को केवल पूंजी
के रूप में देखते हैं, और पूंजी को एक न्याय के रूप में नहीं, मुना.फा
कमाने के एक साधन के रूप में, यानी वन-संपदा अगर संपदा है तो पूंजी है, उस
से हमें ('हमें' यानी सरकार को) मुना.फा होना चाहिए। सारे देश के सारे वन
विभाग संपदा के रक्षण-संवर्द्धन के लिए नहीं, उससे मुना.फा दिखाने के फेर
में हैं-क्योंकि सरकार ने इसी को उनकी दक्षता की कसौटी बना दिया है।
और
अब पानी भी राष्ट्रीय संपदा हो जाएगा (जो कि यों वह है, असंदिग्ध रूप से
है) तो वहां भी जो बुद्धि काम करने लगेगी वह यह नहीं होगी कि पानी सब को
सुलभ हो, वितरण की समान और आवश्यकता पर आधारित व्यवस्था हो। वहां यह बुद्घि
काम करेगी कि सब नदी-नालों, झरनों-स्त्रोतों पर राष्ट्र का (यानी सरकार
का) अधिकार है, और वितरण की व्यवस्था वही ठीक समझी जाएगी, जिससे मुना.फा
हो, आमदनी बढे क्या इससे आगे भी सरकारों की बुद्धि जाएगी क्या हम-मतदाता और
नागरिक-उन्हें बाध्य कर सकेंगे कि वे देश कि संपदा को संपदा की द्टष्टि से
देखें, और उसे न्यास मान कर उसके प्रति अपना उत्तरदायित्व पूरा
करें-क्योंकि देश और राष्ट्र के प्रति उनकी .िजम्मेदारी यही है और हो सकती
है
बिजली, पानी, पेड, पहाडी, वन-इनका अनिवार्य संबंध है। और ये सभी
राष्ट्रीय संपदा हैं-सबका संरक्षण उसी बुद्धि से होना चाहिए-केवल मुना.फे
के लिए नहीं। या जिनकी अ.क्ल मुना.फे से आगे नहीं जाती उन्हें यह भी जानना
चाहिये कि प्रजा का स्वास्थ्य और संरक्षण भी एक मुनाफा है, बहुत बडा
मुना.फा, क्योंकि उस पर राष्ट्र का अस्तित्व ही निर्भर करता है। इस द्टष्टि
से पानी और पहाड ही नहीं, पहाड पर चढता हुआ भालू भी राष्ट्रीय संपदा
है-सारे वन-जंतुओं और पक्षियों-पतंगों तक पर कृषि की, कृषक की और
कृषि-प्रधान इस देश की निर्भरता एक प्रमाणित वैज्ञानिक सार्इ है, केवल
अभिजात संस्कार या सौंदर्य प्रेम नहीं। पर्वतीय वन की हत्या हिमालय की
हत्या है, और अपने पर्वतीय प्रदेश को पानी से वंचित करके हम उसे ही नहीं
उजाडेंगे, बल्कि देश को ही मरु में परिवर्तित करेंगे। वनों के दोहन से जो
भी मुना.फा होने वाला हो, देश ही उजडने लगेगा तो वह मुना.फा भोगेगा कौन
ऊंचाइयों पर पानी की रक्षा करने वाले पेड नष्ट करके अगर हम निचली घाटियों
और तराइयों (आह, क्या नाम था 'तराइयों, तल भी, तर भी, तरु भी'-क्या अब हम
उन्हें 'सुखाइयां' कहा करेंगे) में ऐसे पेड लगाएंगे भी जो पानी को और
सुखाते हैं-बांध और देवदार के बदले स.फेदा और युकलिप्टस तो उससे क्या लाभ
होगा का.ग.ज की लुगदी के ठेकेदार उन पेडों के दाम तो अच्छे दे देंगे, पर उस
का.ग.ज पर हम छापेंगे-क्या केवल अपने उजडने के विवरण
भालू चढ रहा है
पहाड पर- कि देखे कुछ वहां। बेचारा भालू कुछ भी न था वहां। यहां तक कि भालू
भी अब नहीं हैं पहाड पर और सभी पहाड दौडे जा रहे हैं, दौडे जा रहे हैं ं ं



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