बुढापा अभिशाप नहीं

बुढापा अभिशाप नहीं
-कमलादेवी-राधेश्याम आचार्य

बाल्यावस्था में

माता-पिता बडे भार्इ-बहन, चाचा-चाची, बुआ आदि सब बालक का ध्यान रखते हैं

वैसे ही वृद्धावस्था में पुत्र-पुत्रियाँ, नाती-पोते सब दादा-दादी का ध्यान

रखते हैं। वृद्धावस्था में बुद्धि अधिक स्थिर तथा परिपक्व होती है। प्रचुर

ज्ञान तथा अनुभव का भण्डार होता है बुढापा।
मनुष्य की युवावस्था धन

सम्पत्ति अर्जित करने, घर के कार्यों को करने, उत्तरदायित्वों के निर्वहन

के साथ मौज-मस्ती में व्यतीत हो जाती है।
प्रौढावस्था भी शेष

जिम्मेदारियाँ निभाने में चली जाती है। चैन की जिन्दगी वृद्धावस्था में ही

उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर प्राप्त होती है। जो लोग वृद्धावस्था को आराम

से व्यतीत करने की योजना पहले से बना लेते हैं वे उत्तरदायित्वों को

धीरे-धीरे कम करते जाते हैं और उत्तरार्ध चैन से गुजारते हैं। कुछ जीवन के

आखिर में उत्तरदायित्व को निपटाने के लिए रख लेते हैं वे थोडे बोझिल हो

जाते हैं।
जब शारीरिक, मानसिक, आर्थिक शक्तियॅां कम होने लगती है,

ज्ञानेन्दि्रय व कर्मेन्दि्रय जब शिथिल हो जाती हैं, परिवार व समाज के

व्यक्ति भी अवहेलना करने लगते हैं तो समझ लीजिए वृद्धावस्था का पदार्पण है।
जब

मनुष्य सामाजिक जीवन, मिलनसारिता, सेवा-भाव, सद्व्यवहार को खो देता है, तब

बुढापा भार हो जाता है। व्यक्ति दुःखी हो जाता है। नजीर अकबर इलाहाबादी ने

बुढापे को कष्टमय बताया है-
"क्या कहर है यारों, जिसे आ जाय बुढापा
और ऐसी जवानी के तर्इ खाय बुढापा।
इशरत को मिला खाक में, गम लाय बुढापा,
हर काम से, हर बात को तरसाये बुढापा।
सब चीज को रोता है, बुरा हाय बुढापा,
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाय बुढापा।"
मानव

शरीर में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। तन, मन, विचार, शारीरिक आकृति,

व्यवहार, आचरण तथा स्वभाव में परिवर्तन होता रहता है। शास्त्रानुसार ७०

वर्ष की आयु से वृद्धावस्था प्रारंभ होती है, ८९-९० का व्यक्ति वृद्ध तथा

१००-१२० वर्ष की आयु का व्यक्ति वयोवृद्ध कहलाता है।
वृद्धावस्था में

प्रत्येक व्यक्ति के अनुसार भिन्नता पार्इ जाती है, अपने देश में ५० वर्ष

से बुढापे के चिह्न दिखार्इ देने लगते है। इस समय नव-निर्माण की तुलना में

कोशिकाओं का क्षरण अधिक होता है। पाचन तंत्र, रक्तपरिवहन, हाथ-पैर, आँख-कान

आदि इन्दि्रयों के कार्य घटने लगते हैं। मनुष्य में जीवनशक्ति का अभाव

होने लगता है। स्फूर्ति और सक्रियता कम होने लगती है।
असमय बुढापा भी आ

जाता है, इसका कारण असफलताएँ मिलने, व्यवसाय में घाटा, स्वजनों की मृत्यु

के दुःख से व्यक्ति टूट जाता हैं, उनकी हँसी-खुशी अवसाद में बदल जाती है।

वे अन्दर से खोखले होते जाते हैं, आनन्द उनसे छिन जाता है। बहुत से लोभ और

संतान-पौत्र आदि के मोह-ममतावश, क्षमता से अधिक दायित्व निभाने के कारण

बुढापे के शिकार हो जाते हैं। मानसिक रूप से व्यथित रहते हैं। अनेक रोगों

से ग्रस्त हो जाते हैं।
इसके विपरीत विवेकी हानि-लाभ, सुख-दुःख,

मृत्यु-जीवन को शाश्वत मानकर पुरुषार्थ करते रहते हैं, वे निश्चिंत रहते

हैं, ऐसे विचारवान, विवेकी से बुढापा दूर रहता है।
सुखी बुढापे के लिए

सहारा, सहायता व सहयोग की आवश्यकता होती है जो हम अपना स्वभाव, आचरण और

व्यवहार मधुर और विनम्र बनाकर ही प्राप्त कर सकते हैं।
यह भी देखने में

आया है कि पुरानी पीढी और नर्इ पीढी में सामञ्जस्य नहीं पाया जाता। पीढी

अन्तर (जनरेशन गेप) देखा जाता है। बुजुर्ग लोग नर्इ पीढी की जीवन प्रणाली,

आचार-विचार, रहन-सहन, कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप करते हैं। यहीं से मतभेद

होने लगता है, और दरारें बढने लगती हैं। फलस्वरूप तनाव बढने लगता है और

वृद्धावस्था कष्टपूर्ण और वेदनामय हो जाती है।
वृद्धावस्था में भूलने की

समस्या हो जाती है, लेकिन उतनी नहीं जितनी की परिजनों द्वारा आँकी जाती

है। स्वजन लोग कह-कहकर अधिक उजागर कर देते हैं। विशेषकर उन परिस्थितियों

में जब उस वृद्धजन का पक्षधर कोर्इ नहीं होता। तब बहुमत उस पर भारी पडता है

और असत्य भी सच की प्रतीति देने लगता है।
ऐसे कर्इ उदाहरण देखने में

आये हैं कि वृद्धजनों ने कर्इ महत्वपूर्ण पदों पर रहकर अपनी बुद्धिमानी,

ज्ञान, अनुभव का परिचय दिया है। ७७ वर्षीय की आयु में गोस्वामी तुलसीदासजी

ने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी। हेनरी फोडर् ने ८२ वर्ष की आयु में अपने

पिता से उत्तरदायित्व लेकर, उद्योग में इतनी प्रगति की कि विश्व के धनाढ्य

व्यक्तियों में नाम किया। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर को वृद्धावस्था में

साहित्य-साधना के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। जर्मन कवि गेटे ने

अपनी पुस्तक वृद्धावस्था में 'फास्ट' पूर्ण की। राजनीति में तो ८८ वर्षीय

अटलबिहारी वाजपेयी ने कुशलतापूर्वक भारत का शासन चलाया। ७६ वर्षीय डॅा.

ए.पी.जे.कलाम ने राष्ट्रपति का कार्य सुचारू रूप से संचालन किया और अभी भी

विद्यालयों-विश्वविद्यालयों में अपने ज्ञान से लाभ पहुँचाते रहते हैं।

इसलिए वृद्धावस्था कोर्इ अभिशाप है यह नहीं कहा जा सकता। यह तो स्वयंपर

निर्भर है कि आप उसको कैसे जीते है
विशेषज्ञों का मानना है कि बुढापा न

कोर्इ रोग है और न कोर्इ अभिशाप, वरन् मानसिक क्रियाओं, भावनाओं,

विचारधाराओं के साथ शरीर में होनेवाली क्रियाओं का परिणाम है। वैज्ञानिक

परीक्षण कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि हृदय, फेफडे और अस्थियों में इतनी

क्षमता है कि पाँच सौ वर्षों से अधिक समय तक कार्य कर सकते हैं। लेकिन यह

तभी संभव है कि मनुष्य प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन यापन करें। मानव

ने प्रकृति के नियमों के विपरीत कृत्रिम जीवनशैली अपना कर अपना सबसे बडा

अहित किया है।
जीव-विज्ञानी डॅा. एच. सिक्स अपने अनुसंधानों से इस

निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आहार, विहार, संयम और मानसिक संतुलन यदि ठीक

प्रकार से बना रहे तो मनुष्य शरीर की रासायनिक प्रणाली को क्षति नहीं

पहुँचाती। उसके अवयव दीर्घकाल तक कार्य कर सकते हैं। उनके अनुसार अत्यधिक

चिन्ताएँ, असंयम, थकावट, तनाव और परेशानियाँ ही शरीर को झकझोर देती हैं।

इसके अतिरिक्त क्रोध, वासना, उत्तेजना, नशा, दुव्र्यसन भी उतनी ही हानि

पहुँचाते हैं। अतः शान्त, सरल, सन्तुष्ट और प्रसन्नचित्त रहना ही जीवनशक्ति

का रक्षक है।
अधिकतर सेवा निवृत्त व्यक्ति जिन्होंने मानसिक तथा

शारीरिक परिश्रम तथा व्यस्त रहने की आदत छोड दी है, उनके स्वास्थ्य पर

विपरीत असर पडता है वे अवसादों में डूबे रहते हैं। अकर्मण्य, आलसी, सनकी,

वहमी, दुष्ट, दुराचारी और भ्रष्टाचारी का बुढापा भले ही वेदनापूर्ण व्यतीत

हो, अन्यथा वृद्धों को सम्मान और श्रद्धा की द्टष्टि से देखा जाता है। उन

पर हर कोर्इ विश्वास करता है। प्रकृति के निश्छल नियमों का पालन करें।

कर्तव्य कर्म में लगे रहें। लोक मंगल, लोक कल्याण के कार्यों में जुटे रहें

और निष्क्रियता से बचें। व्यस्त रहें और अपने अनुभवों को लाभ समाज को देते

रहें। सुदीर्घ जीवन प्राप्त करें।




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