गीता का वास्तविक उद्देश्य व्यवहार एवं अध्यात्म का समन्वय है

गीता का वास्तविक उद्देश्य
व्यवहार एवं अध्यात्म का समन्वय है

गीता

में संपूर्ण मानव जाति के कल्याण का अमर संदेश है। गीता ने सदाचार को ही

धर्म कहा है। सदाचार से ही त्याग जागृत होता है, और त्याग से ही सच्चा

ज्ञान प्राप्त होता है। भारत के महान संत रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि

गीता का अर्थ समझना है तो 'गीता' इन दो शब्दों को उलटकर बोलो अर्थात्

'तागी' या 'त्यागी'। जो त्यागी है, वह ज्ञानी हो सकता है। परिवर्तन का

दूसरा नाम ही समय है। संसार की हर वस्तु परिवर्तन से प्रभावित है। हर पल सब

कुछ बदलता रहता है इसलिए संसार को क्षण-भंगुर कहा गया है। समय की कसौटी पर

भारत के ॠषियों ने समय को चार भागों में बांटा है, सतयुग, त्रेतायुग,

द्वापरयुग और कलियुग। इस हिसाब से अभी कलयुग चल रहा है। परिवर्तन के नियम

के अनुसार कलियुग में मनुष्य की बुद्धि बहुत स्वार्थी हो जाती है। वह

निरंतर अपनी व अपने परिवार की भलार्इ के लिये ही सोचता रहता है अतः उसका हर

कार्य स्वार्थ साधन से प्रेरित होता है। स्वार्थ के कारण मनुष्य अच्छे व

बुरे में भेद करने का विवेक खो देता है और अपनी दुर्दम इच्छाओं की पूर्ति

के लिये अनैतिक मार्ग अपनाने में भी संकोच नहीं करता। इसी का परिणाम है

समाज में पनपने वाला दुराचरण। झूठ, अन्याय, हिसा, भ्रष्टाचार, छल-कपट, लूट,

चरित्रहीनता जैसी भयंकर बुराइयाँ सदाचरण के अभाव से ही फैलती हैं, जिनसे

समाज व राष्ट्र पंगु हो जाता है। इस स्थिति को नैतिक पतन कहते हैं। गीता

में इस प्रवृत्ति को अंतःकरण की मलिनता या पाप कहा गया है। इस प्रकार जब

स्वार्थ-पूर्ति के लिये अधिक से अधिक लोग पाप में डूबने लगते हैं तो

मनुष्यता के गुणों का लोप होने लगता है। समाज में सर्वत्र अशांति,

असुरक्षा, भय, निराशा और कुंठा का वातावरण निर्मित होने लगता है। इस प्रकार

जब परहित पर स्वहित हावी हो जाता है तो संसार से शांति, सद्भावना और प्रेम

की भावनाएँ लुप्त-सी हो जाती हैं। गीता मानव जाति को भयंकर नैतिक पतन से

उबारने के लिये सच्चरित्रता और त्याग का महान संदेश देती है। गीता कहती है

कि प्रत्येक मनुष्य अपने मूल्य व अपने महत्व को इस द्टष्टि से पहचानने का

प्रयास करे कि वह उस विश्व का ही एक अंश है, जिसमें वह रहता है। यही

आत्मचितन का मार्ग है। आत्मचितन से ही हृदय में त्याग की प्रतिष्ठा होती

है। इस अनुशीलन से स्पष्ट है कि गीता में व्यवहार एवं अध्यात्म का

उत्कृष्टतम समन्वय है।
-गोपालचंद्र जोशी, रतलाम




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