प्रतिक्रिया के विषय में

-ओम ठाकुर
जून अंक में प्रकाशित मेरे लेख 'औदीच्य बंधु को
समाज का आर्इना बना रहने दें' में प्रबुद्ध पाठकों से प्रतिक्रिया
आमन्त्रित करने का मेरा उद्देश्य 'औदीच्य बंधु' की द्टढता के आधार तलाशने
और इसके निरन्तर विकास की सामजिक द्टष्टि से था, कि पाठक 'औदीच्य बंधु' के
बारे में क्या धारणा रखते हैं और समाज के इस पत्र की उन्हें कितनी चिन्ता
है।
इस लेख का आशय व्यक्तिगत कदापि नहीं था। मैं यह भी स्पष्ट कर दूँ कि
न मुझे न श्री धर्मेन्द्र रावल को किसी से, किसी प्रकार की कोर्इ शिकायत
रही है, न है। हमने नितान्त व्यक्तिगत कारणो से 'औदीच्य बंधु' की सेवा से
निवृत्ति ली है और लेख में भी यह स्पष्ट था कि पाठकों की प्रतिक्रिया
आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त हो। तथा यह भी लिखा था कि 'इस प्रकार की चर्चाएँ
मानसिक-वैचारिक भोजन ही प्रदान नहीं करतीं, पत्रिका के प्रकाशन को ज्यादा
अर्थपूर्ण और सम्पन्न बनाते हुए उसका भविष्य सँवारती हैं।'


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