विरासत कायम रहे

- जमनाशंकर ठाकुर, भोपाल

जून २०१५ के औदीच्य बंधु के अंक में श्री ओम ठाकुर ने
संपादकीय कर्त्तव्य एवं दायित्व का विस्तार से विद्वतापूर्ण विवेचन करते
हुए पाठकों से विचार आमंत्रित किए हैं।

औदीच्य बंधु एक प्रज्ञावान समाज
का मुख-पत्र है। इसने अपने जीवन के ९० वर्ष पूर्ण किए हैं। हिन्दी जगत में
मेरी द्टष्टि में इतनी पुरानी कोर्इ और पत्रिका नहीं है। बंधु के इस
दीर्घ जीवन के पीछे जाति के निष्पक्ष, त्यागी, सेवाभावी एवं दूरदर्शी
संपादकों की एक गौरवशाली परम्परा रहती आर्इ है। आज भी बंधु अपने गरिमामय
इतिहास के अनुकूल गरिमामय स्वरूप में समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
फिर
भी औदीच्य बंधु का अपना एक न्यास है। प्रतिवर्ष इसकी आडिटेड बैलेंस शीट
बंधु में प्रकाशित होती रही है। 'समिटि समिटि जल भरहि तलावा'। किस कठिनार्इ
से इस न्यास की वर्तमान पूंजी एकत्र हो पार्इ है इससे समाज का प्रत्येक
सदस्य भली-भाँति अवगत है। इस पूंजी के बल पर ही आज बंधु अपना वर्तमान
स्वरूप संवार सका है तथा इस साज-सज्जा के साथ इसके आगे के जीवन के प्रति
आश्वस्त हुआ जा सकता है। इस व्यवस्था की स्थापना करने वाले समाज के
पूर्वजों की मंशा को द्टष्टि से ओझल नहीं होने देना चाहिए। उचित है कि यह
विरासत कायम रहे।

- जमनाशंकर ठाकुर, भोपाल


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