पत्र-पत्रिकाओं की आत्मा होते हैं-सम्पादक

उद्धव जोशी
" सामाजिकों का परम कर्तव्यन है कि "औदीच्य बन्धु" को समाज का आर्इना बना

रहने दें"। इस चिन्तनशील आलेख में वरेण्य श्री ओम ठाकुर ने पत्रकारिता के

मूल्यों को सुरक्षित करते हुए सचेत किया है कि दो विपरीत विचारधाराओं के

बीच दोनों के विचारों को पत्रिका में यथोचित स्थान देकर समाज की चेतना को

जाग्रत करना संपादक का सबसे उत्तरदायित्वपूर्ण काम है।
संपादक अपनी कलम

की जादुर्इ शक्ति का प्रयोग पाठक के अन्तर्मन के उद्बोधन के लिए करता है।

वह जाग्रत समाज की स्थापना करना चाहता है और समाज के प्रत्येक प्राणी में

चेतना का प्रवाह लाना चाहता है।


बागवान की तरह संपादक भी सदैव अपने कार्य के प्रति

निष्ठावान और स्वतन्त्र होता है। कांट छांट की स्थिति या समाचार न छापने की

स्थिति में लेखक या पाठक की नाराजी को भी हृदयंगम करता है। संपादक अपनी

दूर द्रष्टि और नेक इरादा रखते हुए समाज के हित में सोचता और प्रकाशन करता

है। इसके बाद भी यदि उनके विरूध्द अति का प्रदर्शन हो जावे तो मानवीय

स्वभाव होने से ठेस लगना स्वाभाविक है। यही मनस्थिति लेखक व पाठक की भी

होती है इसलिए तीनों को कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करना चाहिए।


संपादक में चाणक्य-सी तीक्ष्णता और विदुर सी नीतिगत कुशलता का समन्वय रहता

है। संपादक का अंदाजे बयां कुछ और ही होता है। वह प्रबुध्द पाठक के लिए

गंभीर है ,सामान्य पाठक के लिए बोधगम्य और कुछ के लिए दुष्कर। संपादक ऐसा

उपदेश देता है जो प्रत्येक मनुष्य के लिए वरेण्य हो। उसके प्रत्येक कथन

में, फिर वह कटु ही क्यों न लगे, सच और समाज का हित छिपा होता है।
'औदीच्य

बन्धु' के संपादक मंडल व्दारा बिना किसी भेदभाव के अपनी महत्वपूर्ण भूमिका

को आज तक निर्भीकता, सजगता और सतर्कता से निभाया जाता रहा है। यही कारण है

कि आज औदीच्य बन्धु और पाठको के बीच एक दूसरे से आत्मीय रिश्ता जुड चुका

है। फिर भी कुछ तो ऐसा है कि औदीच्य बन्धु में कुछ समय से संपादकों का नाम

से रहा है फिर भी वे अपने कर्तव्यों का निष्पादन कर रहे हैं और बन्धु का

प्रकाशन समय पर हो रहा है। आज ९१ वर्षीय औदीच्य बन्धु की यह स्थिति गम्भीर

रूप से विचारणीय है। सभी को मिलकर इसका समाधान विवेक पूर्ण तरीके से करना

होगा। संपादकीय अग्रलेख पत्र पत्रिका की ऐसी खिडकी है, जिससे आते हुए मलय

पवन के झोंके सहज सरल लोगों को चितनशीलता की उर्वरा भूमि प्रदान करते हैं

तथा सामाजिक रचना विधान और राजनीतिक परिद्टश्य की मीमांसा द्वारा

लोकतन्त्र में जनआस्था को बलवती करते हैं। संपादकीय टिप्पणियां पाठक के

भावजगत के लिए टॅानिक का काम करती हैं। जिनसे आज 'औदीच्य बन्धु' सूना और

अधूरा दिखार्इ दे रहा है। 'औदीच्य बंधु' महासभा का आत्मनिर्भर मुखपत्र है

अतः औदीच्य बन्धु न्यास को सर्वाधिकार सुरक्षित करना होगा ताकि वह 'औदीच्य

बंधु' की गरिमामय परम्परा और सम्मान की रक्षा कर सके। औदीच्य बन्धु के

प्रधान संपादक श्री ओम ठाकुर एवं संपादक श्री धर्मेन्द्र रावल ने सदैव अपनी

भूमिका का निर्वहन नीतिगत कुशलता और बिना किसी भेदभाव के करते हुए 'बन्धु'

के पाठकों को पठनीय सामग्री प्रदानकर एक दूसरे का अटूट रिश्ता जोडने में

अपने सम्पादकीय कौशल का परिचय दिया है। इसी कारण आज 'औदीच्य बन्धु' पाठको

की पहली पसन्द बन गया है। ऐसी अनमोल स्थिति को यथावत बनाये रखने हेतु समाज

द्वारा 'औदीच्य बन्धु' के संपादक मण्डल के मन की भावनाओं को प्राथमिकता के

साथ समझना आवश्यक है।

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