ऐसे होते थे महासभा के सम्मेलन : भाग-२

'औदीच्य बंधु' के अप्रैल अंक में सन् १९३७ में पुष्कर में सम्पन्न २९ वें अ.भा. औदीच्य ब्रह्म्समाज तथा षष्ठ सहस्त्रौदीच्य महासभा के संयुक्त अधिवेशन की कार्यवाहियों बाबद विवरण का प्रथम भाग प्रस्तुत किया गया था। इस सामग्री के बारे में पर्याप्त प्रतिसाद मिला है। पाठकों के आग्रह पर प्रस्तुत है उक्त सम्मेलन के विवरणकार्यवाही का द्वितीय भागऐसे होते थे महासभा के सम्मेलन : भाग-२द्वितीय दिवससोमवार २२ अप्रैल को प्रातः ९ बजे से सभा का कार्य प्रारम्भ हुआ। मंगलाचरण के पश्चात् सर्व प्रथम निम्नलिखित शोक प्रस्ताव सभापतिजी ने उपस्थित किया, जो सर्व सनों ने खडे होकर स्वीकार किया। १ शोक प्रस्ताव - 'यह महासभा अपनी ज्ञाति के पुरुष रत्न' 'औदीच्य सुधारक' पं. रघुनाथजी द्विवेदी केकडी निवासी तथा बालकृष्ण बापूजी वकील बडनगर, पं. विद्याधरजी त्रिपाठी आगरा, डा. अमरनाथजी जैपुर, तथा श्रु. चिरंजीलालजी बरेली हाल मथुरा की मृत्यु पर हार्दिक शोक प्रकट करती है तथा उनके शोक संतप्त परिवारों के साथ हार्दिक सहानुभूति प्रकट करती है और र्इश्वर से प्रार्थना करती है कि इन स्वर्गस्थ आत्माओं को शान्ति प्रदान करें।'

-सभापति द्वारादूसरा प्रस्ताव महासभा की कार्यवाही हिन्दी भाषा में होने का पं. बलदेव प्रसादजी शर्मा संपादक 'औदीच्य बन्धु' द्वारा उपस्थित किया गया। जिसका अनुमोदन श्री गौरीशंकरजी शुक्ल (नाथद्वारा) ने किया। प्रस्ताव का विरोध पं. सोमेश्वरजी शास्त्री (कुचामन) ने किया कि हिन्दी भाषा में कार्यवाही होने से नाम मात्र को बची हुर्इ गुजराती भाषा भी महासभा के कागजात से उड जायगी। और आगे की सन्तानें गुजराती भाषा बिलकुल भूल हो जायेंगी और अपने को गुजराती भी नही कहेंगी। जब उनकी वेष-भूषा, भाषा गुजराती रहेंगी ही नहीं तो वे गुर्जरों के एक अंग औदीच्य कैसे कहलायेंगे। विरोध का समर्थन शु. सोमनाथजी (बंबर्इ) तथा पं. हरि प्रसादजी किशनगढ वालों ने किया। बहुत देर वाद-विवाद होने के पश्चात् और पूर्ण मतभेद होने से दोनों दलों ने सभापतिजी की अनुमति से राय बहादुर पं. चम्पालालजी लखनौ को इस प्रश्न का निर्णय करने को मध्यस्थ बना दिया। जिन्होंने विचार पूर्वक अपना निर्णय दिया कि इस बार महासभा की कार्यवाही सब भाइयों की जानकारी के लिए हिन्दी भाषा में ही छपार्इ जाय। महासभा का कार्य गुजराती भाषा में ही हो। यह निर्णय दोनों दलों ने स्वीकार किया।'३ प्रस्ताव - "औदीच्य बन्धु की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय थावा ने कारण एनूं प्रकाशन बन्द थर्इ जावूं सम्भव छे, जेथी महासभा नूं प्रचार पण बन्द थाशे अतएव अ. महासभा सर्व भाइयों थी 'बन्धुनी' विशेष सहायता मांटे ५००- रु. नी अपील करै छै अने सर्व सदस्यों थी अनुरोध करेछे कि ते लोग एनी स्थिति पर विचार करी ते ना ग्राहक वणे अने वणावे" प्रस्तावक-ज्यो.राधेश्याम द्वि. अनुमोदक-व्या. गंगाधरजीप्रस्तावक ने 'औदीच्य बन्धु' की सेवा तथा उसकी आवश्यकता बतलाते हुए ५००-रु. की अपील की, जिसमें उपस्थित सनों ने स्वीकार कर १७५-रु. की सहायता के उसी समय वचन मिले और ५०-रु. उसी क्षण प्राप्त हुए। (दानदाता की नामवली परिशिष्ट में दी जाकर २२ महानुभावों द्वारा प्रदत्त राशि रु. १६८- का उल्लेख किया गया)४ प्रस्ताव - "महासभानी सभ्यसहायता तथा औदीच्य कोष नूं अधिकांश समहवणासुधा प्राप्त न थी थयूं तेना प्राप्त करवामाटै निम्न महानुभावोनी एक समित वणावै छे किते जे भी उपाय निश्चय करें तेनें द्वारा कोषनूं द्रव्य एकत्रित करवा तथा वधारवानू उद्योग करें।'समिति-सभापति महोदय,देवताबलभद्रजी प्रस्तावक-राजाराम पंड्या, चि. चम्पालाल जी रा.ब., पं. चतुर्भुज जी कलकत्ता, अनु. ज्यो.बा.श्यामसुन्दरजी एवं ज्यो. बा. प्रभाशंकर जी (सर्व सम्मति से स्वीकृत)५ प्रस्ताव - 'यह महासभा प्रस्ताव करती है कि महासभा के सभ्य प्रतिज्ञा पत्र के पीछे निम्नलिखित नियम सामूहिक रूपेण व्यक्तिगत उन्नति करने के उद्देश्य से छपाये जांय।'१-अध्यात्मोन्नति करना ब्राह्म्णों का प्रधान तथा सर्वोपरि कर्तव्य होने के कारण प्रतिदिन सन्ध्योपासन, पाठ पूजा किवा र्इश चिन्तन आदि नियम पूर्वक करना। २-अपने उदार भावों को कृति में परिणित करने की अपेक्षा से निज की आय का यथाशक्ति भाग से धर्मकार्य, परोपकार किवा विद्या-प्रचार में उपयोग करना। ३-निज का व्यवहार निष्कलंक रखने के लिये सदा सावधान रहना और सदाचार सहन-शीलतादि सद्गुणों को अधिकाधिक विकास करने सम्बन्धी कुछ आवश्यकीय सिद्धान्त अंगीकार करके उनको पूर्णतया निभाने के अर्थ सतत यत्न-शील होना। ४-अपनी स्त्री, कन्या, पुत्र तथा आश्रित बालकों को यथासंभव सुशिक्षित बनाने का प्रयत्न करना, और विद्या-प्रचार की द्टष्टि से विवाहादि प्रसंगों के उपलक्ष्य में वस्त्रादि की अपेक्षा धार्मिक किवा नैतिक पुस्तकें भेेंट करने की ओर विशेष ध्यान देना। ५-अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने पर निज के गुण तथा ज्ञान की वृद्धि करने के उद्देश्य से उत्तम तथा उपयोगी ग्र्रन्थादि का यथा संभव अवलोकन करते रहना किवा ऐसे रचनात्मक कार्य करना जिससे वंश जाति, अथवा जन समूह में संघ सुख तथा वैभव की वृद्धि हो। ६-अपने पुत्र तथा आश्रित लडकों के ल उनके अठारह वर्ष पूर्ण होने के पूर्व नहीं करना इसी प्रकार कन्या तथा आश्रित-लडकियों के ल भी रजस्वला होने के पहिले करना और न ऐसे लों में योग देना। ७-विवाहादि अवसरों पर अश्लील गाने की कुप्रथा का प्रचार न होने देना। इसी प्रकार अनावश्यक बातों में वृथा व्यय भी नहीं करना। ८-प्रसंगोपात्त शास्त्रानुसार यथाशक्ति ब्राह्म्ण भोजन करना अच्छा है, अर्थात् करना चाहिये परन्तु आर्थिक स्थिति अनुकूल नहीं होने पर भी जो अपने सिर कर्ज का अनुचित बोझा उठा कर प्रथा रूप से ज्ञाति भोज दें उनके यहां ऐसे प्रसंग पर भोजन नहीं करना। ९-मृत्यु आदि अवसरों पर स्वाभाविक रुदन को रोकने की आवश्यकता नहीं, परन्तु प्राचीन परिपाटी निभाने के निमित्त रोना किवा पीटना बहुत अनुचित होने से ऐसी कुप्रथा को मिटाना। १०-अपने ज्ञाति हित साधन संबंधी कार्यों में यथा संभव सहायता करना और इसी लक्ष्य से व्यक्तिगत स्थिति सुधारने की ओर उचित ध्यान देना। (सर्व सम्मति से स्वीकृत)प्रस्तावक-ज्यो. राधेश्याम द्विवेदी। अनुमोदक-पं. सोमेश्वरजी शास्त्री। समर्थक-पं. चन्द्रशेखरजी शास्त्री।तदनन्तर ज्यो. राधेश्यामजी द्विवेदी का. मंत्री ने अगि्रम वर्ष के लिए महासभा की व्यवस्थापक सभा के सभ्यों के नाम सुनाए (जो परिशिष्ट में मुदि्रत हैं) सर्व सम्मति से स्वीकृत हुए।तत्पश्चात् मंत्री द्वारा स्वागत मण्डल को और विशेषतः उसके मंत्री पं. गंगाधरजी व्यास तथा सेठ सूआलालजी एवं कोषाध्यक्ष पं. भंवरलालजी व्यास को सभा की ओर से अनेक धन्यवाद दिए, और उनकी सेवाओं की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की। पं. सुआलालजी मेहता नाथद्वारा को भोजन व्यवस्था का समुचित प्रबंध रखने में पूर्ण परिश्रम उठाने के लिये मंत्री ज्यो. राधेश्यामजी द्विवेदी ने एक पदक अपनी ओर से देकर हार्दिक धन्यवाद दिया। अन्त में सभापतिजी के उपसंहारात्मक भाषण के तदनन्तर 'श्री माधव गोविन्द की जय' के साथ सभा का कार्य समाप्त हुआ।व्यवस्थापक सभा के सभ्य सं. १९९२सभापति-(१) श्री पं. कन्हैयालालजी गोपालजी उपाध्याय रतलाम। मन्त्री-(२) पं. चतुर्भुजजी औदीच्य कलकत्ता सं. मंत्री-(३) पं. बलभद्रजी द्विवेदी कोटा, ज्यो. राधेश्यामजी द्विवेदी मथुरा कोषाध्यक्ष-(४) ज्यो. श्यामसुन्दरजी द्विवेदी मथुरा कोषनिरीक्षक (५)आ. प्यारेलालाजी वेदिया जैपुरसदस्य-(६) पं. गोविन्दवल्लभजी शास्त्री सोरों (७) अ. प्रभाशंकरजी मथुरा (८) पं. राजारामजी बनारस (९) आ. गणेशलालजी कलकत्ता (१०) पं. सोमेश्वरजी शास्त्री कुचामन (११) त्रि. श्यामसुन्दरजी लश्कर (१२) त्रि. रामप्रसादजी मेरठ (१३) पं. गंगाधरजी व्यास इन्द्रगढ (१४) पं. बलदेवप्रसादजी अजमेर (१५) पं. चन्द्रशेखरजी शास्त्री ब्यावर (१६) पं. रणछोडलालजी द्विवेदी नाथद्वारा (१७) देवता शु्. बलभद्रजी कोटा (१८) रा.ब.पं. चम्पालालजी त्रिवेदी लखनऊ।इसी रपट में गुजरात प्रांत के ३४ एवं उत्तर भारत से २१ प्रतिनिधियों की नामावली दी जाकर विभिन्न स्थानों के ४२ महानुभावों की सूची स्वागत सदस्य के रूप में तथा १५ विशिष्ट दर्शकों का नामोल्लेख भी किया गया है। पुष्कर के उपरोक्त सम्मेलन के अनुक्रम में ही पारित प्रस्तावों के अनुपालन पर विचारार्थ ७ जुलार्इ १९३५ को श्री अखिल भारतवर्षीय औदीच्य ब्रह्म् समाज की व्यवस्थापक मंडल सभा अहमदाबाद की बैठक औदीच्य विद्यार्थी भवन में सम्पन्न हुर्इ, जिसमें ११ सदस्य सम्मिलित हुए थे। इस सभा की कार्यवाही के अनुसार ६ प्रस्ताव पारित हुए। प्रथम प्रस्तावानुसार ७ सदस्यों की समिति इस उद्देश्य से बनार्इ गर्इ कि पुष्कर सम्मेलन के प्रस्तावों की उपयोगिता निर्णय लेकर कार्यान्वयन हेतु योग्य विचार सभा के सम्मुख रखे। द्वितीय प्रस्ताव यह था कि पुष्कर सम्मेलन के निश्चयानुसार ५०- से लेकर ७५- मासिक का वैतनिक मंत्री पत्रों में विज्ञापन देकर योग्य व्यक्ति नियुक्त किया जावे। इस हेतु ४ सदस्यीय समिति बनार्इ गर्इ। तीसरा और चौथा प्रस्ताव अविकल इस प्रकार है-३ प्रस्ताव - पुष्कर सम्मेलन के छठे ठहराव के अनुसार औदीच्य ज्ञाति का इतिहास तय्यार करने के लिए निम्न सज्जनों की एक समिति निर्माण की जाती है।रा.ब. गौरीशंकरजी ओझा अजमेेर, श्री. चिरंजीलाल माधवलाल व्यास अजमेर, श्री. रविशंकर रावल, श्री. मोहनलाल गोपाल जी दवे, श्री. राधेश्यामजी द्विवेदी, श्री. भार्इलाल जानी (मंत्री), श्री. पुरुषोत्तम दास भट्ट उपरोक्त सभ्य अपनी रिपोटर् ब्रह्म् समाज के मन्त्री जी को भेजकर स्वीकृत करार्इ जावेगी।प्रस्तावक-श्री कान्ति लाल रावल, अनुमोदक-श्री चंद्रशंकर त्रिवेदी, सर्व सम्मति से पास ४. प्रस्ताव- औदीच्य बन्धु को इस वर्ष के लिए सहायता दी जाय उसमें ब्रह्म् समाज के समाचार प्रकाशित होना चाहिए और सब मान्य मन्त्री की सूचना नुसार पाँच स्थानों को नियमित रूप से पत्र भेजा जाय।पाँचवां प्रस्तुत प्रस्ताव विद्यार्थियों को सहायता बाबद था। तद्नुसार १४ विद्यार्थियों की सूची देकर उन्हें २०- से ५०- सहायता देने का निर्णय लिया गया। छठवाँ प्रस्ताव अहमदाबाद विद्यार्थी भुवन की दूसरी मंजिल में विद्यार्थियों की सुविधा हेतु पाटर्ीशन डलवाने का मंजूर हुआ। अन्तिम प्रस्ताव श्री रविशंकर रावल ने रखा, जिसका अनुमोदन श्री देवशंकरजी पंचोली द्वारा करते हुए सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि पुष्कर सम्मेलन के समय निर्माण की गर्इ समिति के मंत्रीगण अब तक के कार्य को प्रकाशित करने में अवकाश मांगते थे, पर यह कार्य अगली सभा पर रखा जाय।प्रस्तावक- श्री. रविशंकर रावल, अनुमोदक-श्री. चन्द्रशंकर त्रिवेदी, सर्व सम्मति से पासमाननीय भट्ट महोदय तथा अन्य उपस्थित सहयोगी बन्धुओं एवं बहनोंआज इस तीर्थराज पुष्कर में आप सनों का स्वागत करते हुए मैं अपने को कृतार्थ मानता हँू। अपने जीवन में अब तक मुझे समय-समय पर अनेक साहित्यिक संस्थाओं के अधिवेशनों में सम्मिलित होने का सुअवसर मिलता रहा है किन्तु मेरे लिए आज के इस शुभ अवसर का भिन्न स्वरूप है, क्योंकि इस समय मुझे अनेक सुयोग्य, वयोवृद्ध एवं ज्ञान-सम्पन्न औदीच्य बन्धुओं का और कार्यपटु सनों के विद्यमान होते हुए भी इस महत्वपूर्ण कार्य का दायित्व मुझ-जैसे जरा-जीर्ण वृद्ध पुरुष के निर्बल कन्धों पर क्यों रखा गया सेवा धर्म के सम्बन्ध में इस देश के प्राचीन विद्वानों का मत है कि 'सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः।' ऐसी दशा में मुझ जैसे एक साधारण व्यक्ति से आप सब महानुभावों की सेवा का यह गुरुतर कार्य किस प्रकार सम्पन्न हो सकेगा, इस संदिग्ध प्रश्न को यहीं स्थगित कर मैं उपस्थित सनों कंी सेवा में यही निवेदन करना उचित समझता हूूूंॅ कि आप-सद्टश अनेक सुयोग्य ज्ञाति-बन्धुओं का दर्शन-लाभ और हमारे अधिवेशन के उत्साही स्वागत मन्त्री श्री राधेश्यामजी द्विवेदी का अनवरत पे्रमपूर्ण आग्रह ही मेरे दायित्व-ग्रहण में प्रेरक बने हैं। सन-वृन्द सर्व प्रथम मैं आप सब महानुभावों की सेवा में स्वागत-समिति की ओर से उन सब त्रुटियों के लिए क्षमा-याचना आवश्यक समझता हँू, जो आपके सत्कार तथा आतिथ्य में हमारी ओर से हुर्इ हों, और जिनके प्रति आपने 'परदेश कलेश नरेशन को' इस वाक्य को स्मरण रखते हुए अपनी स्वाभाविक उदारतावश ध्यान न दिया हो।आज यह सारा औदीच्य ब्राह्म्ण-समाज जिस स्थान पर एकत्र हुआ है, उसका भारतवर्ष के धार्मिक इतिहास में विशेष महत्त्व है। भारत में पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में क्रमशः जगन्नाथपुरी, द्वारकापुरी, बद्रीनारायण और सेतुबंध रामेश्वर हिन्दुओं के चार पवित्र धाम हैं, किन्तु इन चारों के मध्यवर्ती सुप्रसिद्ध पुष्कर क्षेत्र की यात्रा किये बिना चार धाम की यात्रा भी सफल नहीं मानी जाती। यही कारण है कि पुष्कर की संज्ञा तीर्थ नहीं, किन्तु 'तीर्थराज' अथवा 'तीर्थगुरु' है। पुष्कर की स्थापना वैदिक काल के प्राचीन यज्ञ के आधार पर हुर्इ थी, और जगत्स्त्रष्टा ब्रह्म ने, जनश्रुति के अनुसार यहाँ यज्ञ किया था। इस परम पवित्र पुण्यक्षेत्र का वर्णन अनेक अति प्राचीन ग्रंथों-रामायण, महाभारत, विविध पुराणों,स्मृतियोें तथा पिछले काव्यों में मिलता है। महाभारत के वनपर्व में इस तीर्थराज के सम्बन्ध में सुस्पष्ट शब्दों में लिखा है-अस्मितीर्थे महाभाग नित्यमेव पितामहः। उवास परमप्रीतो भगवान् कमलासनः।।यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु मधुसूदनः। तथैव पुष्करं राजंस्तीर्थालरमरदिरुच्यते।।इससे यह सिद्ध है कि जिस प्रकार हमारा वैदिक धर्म अनादि काल से चला आता है, उसी तरह पुष्कर भी आदितीर्थ माना जाता है। 'पुष्कर' शब्द का अर्थ 'कमल' है। ब्रह्मजी यज्ञ करने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज में थे, इतने में उनके हाथ से कमल छूटकर भूमि पर तीन स्थानों पर जा गिरा, जहाँ से जल प्रकट हुआ। तब ब्रह्म ने उतरकर कमल-सूचक 'पुष्कर' शब्द से उन तीनों स्थानों का नाम 'पुष्कर' रखा, ऐसी जनश्रुति अब तक प्रचलित है। ये त्रिपुष्कर आज भी विद्यमान हैं और इनकी परिक्रमा एवं स्नान का विशेष महत्त्व माना जाता है। 'पुष्कर' के पर्यायवाची 'पद्म' शब्द से युक्त पद्मपुराण में इस पवित्र क्षेत्र का बहुत विशद वर्णन मिलता है, किन्तु इस प्राचीन एवं प्रतिष्ठित पुण्यक्षेत्र के धार्मिक और ऐतिहासिक स्वरूप का श्रोतागणों को यथेष्ट परिचय देने के लिए इस समय उपयुक्त अवसर न होने से यह चर्चा यहीं स्थगित की जाती है।उपस्थित औदीच्य ब्रह्म्-बन्धुओं को आज मुझे यह स्मरण दिलाने कि विशेष आवश्यकता नहीं है कि अति-प्राचीन काल से हमारे पूर्वज बहुत उ कोटि के धर्मनिष्ठ एवं सदाचार-सम्पन्न ब्राह्म्ण रहे हैं, जो इसी प्राचीन वाक्य से स्पष्ट है कि 'औदीच्य ॠषयः सर्वे बदि्रकाश्रमवासिनः।' प्राचीन काल में वेद-वेदांग-विद्या में इस जाति का विशेष सम्मान रहा था, जिससे विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में काठियावाड, गुजरात, कच्छ, लाट, कन्नौज, आबू के प्रदेश तथा मारवाड के अधिकांश के स्वामी गुजरात के परम प्रतापी सोलंकी राजा मूलराज ने जब करोडों रुपयों के व्यय से सिद्धपुर में रुद्रमहालय नामक भव्य एवं सुविशाल शिवालय का निर्माण करवाया, तब उक्त शिव-मन्दिर की प्रतिष्ठा के लिए इस धर्मप्राण नरेश्वर ने कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, कान्यकुब्ज (कन्नौज), काशी, प्रयाग, गंगाद्वार (हरद्वार) आदि स्थानों से विद्वान्, वेद-विद्या-निष्णात और यज्ञ-कर्म-निपुण १००० तपस्वी ब्राह्म्णों को निमंत्रित किया और अपने विशाल राज्य के भिन्न-भिन्न विभागों में उन्हे बहुत से गाँव, कुएँ आदि देकर अपने राज्य में ही रखा। उदीची (अर्थात् उत्तर) दिशा से इनके सिद्धपुर आने के कारण ये तपस्वी तुल्य ब्राह्म्ण औदीच्य (अर्थात् उत्तर-निवासी) कहलाए। इनकी संख्या १००० होने से इनका समुदाय सहस्त्र-औदीच्य नाम से प्रसिद्ध हुआ, यह कथन निर्विवाद सिद्ध है। समय पाकर उन ब्राह्म्णों के वंश में वृद्धि होती गर्इ और सिद्धपुर तथा उसके चारों और के प्रदेश पर जब मुसलमान सुलतानों का शासन जमने लगा, तब ये ब्राह्म्ण सिद्धपुर के केन्द्र से राजस्थान, मालवा, गुजरात आदि भिन्न-भिन्न प्रान्तों से जा बसे। वेद-ज्ञान-सम्पन्न एवं सदाचारी कर्मनिष्ठ ब्राह्म्ण होने के कारण औदीच्य जिस किसी प्रान्त में चले गये, वहाँ राजा-प्रजा दोनों से उनका यथेष्ट सम्मान होता रहा। समय समय पर इस ब्राह्म्ण समाज में अनेक विद्वान् उत्पन्न होते रहे हैं, किन्तु यहाँ उन सबकी नामावली उपस्थित करने का समय नहीं है। केवल दो-एक नामों की ओर संकेत करता हुआ मैं इतना ही निवेदन करूंँगा कि वर्तमान हिन्दी-गद्य के आदि-प्रवर्तक श्रीलल्लूजीलाल इसी ज्ञाति के भूषण थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती, जिनका नाम आज भारत में ओर से छोर तक प्रसिद्ध है, न केवल अपने समय के एक प्रबल समाज-सुधारक थे, किन्तु उनके प्रकांड पांडित्य का सिक्का अब तक सभी लोग मानते हैं। इस नर-रत्न का जन्म काठियावाड के टंकारा गाँव में एक औदीच्य ब्राह्म्ण-कुल में ही हुआ था। मुझे बम्बर्इ नगर में इस पुरुष-पुंगव के व्याख्यान सुनने का सुअवसर मिला था। अस्तु। कहना न होगा कि ऐसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ब्राह्म्ण-समाज का आज नव वर्ष अनन्तर इस परमपावन और पुराण-प्रसिद्ध तीर्थगुरु पुष्कर में पुनः अधिवेशन होने से सोने और सुगन्ध का संयोग हुआ है। यहाँ ब्रह्म्समाज की चर्चा और तीर्थराज का स्नान, दोनों शुभ कार्य सम्पन्न होने से 'एक पंथ दो काज' की उक्ति चरितार्थ होती है।यह तो सभी उपस्थित सनों को भली भाँति विदित है कि ब्रह्म्-समाज के द्वारकापुरी के अधिवेशन के पश्चात् आज लगभग नव वर्ष के अनन्तर यह अधिवेशन पुनः हो रहा है, इससे यह सुस्पष्ट है कि इतने समय तक ब्रह्म्-समाज का एकत्र न होना कुछ शिथिलता का द्योतक अवश्य है। यद्यपि मुझे यह देखकर परम हर्ष होता है कि केवल नव वर्ष के उपरान्त ही पुनः ब्रह्म्-समाज का यह अधिवेशन किया जा रहा है, किन्तु साथ ही इस बात की भी आवश्यकता प्रतीत होती है कि उन्नति के वर्तमान युग में हमें ब्रह्म्-समाज के शैथिल्य को दूर करना चाहिये और समय-समय पर ऐसे सुअवसर उपस्थित करने चाहिए, जब ब्रह्म्-समाज के सब हितचिन्तक एकत्र होकर अपनी जाति के भावी उत्थान के सम्बन्ध में युक्तियुक्त विचार-विनिमय कर सकें।यहाँ मै आप सब सनों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहता हँू कि अब तक ब्रह्म्-समाज केवल गुजरात और काठियावाड की संस्था के रूप में कार्य करता रहा है किन्तु इसके सम्बन्ध में यह विचारणीय है कि क्या औदीच्य-बन्धु इस समय भारतवर्ष के केवल उसी भाग मेें रहते हैं, जिसे नक्शे में गुजरात और काठियावाड नामों से सूचित किया जाता है इसका उत्तर यही होगा की नहीं, औदीच्य ब्राह्म्ण भारत के बहुत से प्रान्तों में पर्याप्त संख्या में बिखरे हुए हैं। वर्तमान समय को लक्ष्य में रखते हुए यह न्याय-संगत नहीं प्रतीत होता कि विभिन्न प्रान्त-वासी औदीच्य बन्धुओं की ओर आँखे मँूदकर ब्रह्म्-समाज केवल गुजरात-काठियावाड पर अपनी सारी शक्ति केन्दि्रत करते रहे। वस्तुतः देखा जाय तो गुजरात-काठियावाड अन्य प्रान्तों की अपेक्षा कर्इ बातों में विशेष उन्नत हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा अन्य प्रान्तों की ओर ब्रह्म्-समाज का लक्ष्य होना नितान्त आवश्यक है। इसलिए उपस्थित सनों से मेरा विनम्र निवेदन यही है कि जिन-जिन प्रान्तों में औदीच्य-बन्धुओं की बस्ती है वहॅां के प्रमुख नगरों में ब्रह्म्-समाज की शाखाओं की स्थापना होनी चाहिये, जिससे भिन्न-भिन्न केन्द्रों में समय-समय पर जाति की उन्नति पर विचार करने के साधन सुलभ हो सकें। इसके सिवा इससे एक लाभ यह भी होगा कि अन्य प्रान्तों के औदीच्य बन्धुओं का ध्यान भी ब्रह्म्-समाज की ओर आकृष्ट होगा, और वे सब अपनी-अपनी उन्नति की योजनाओं में ब्रह्म्-समाज से निरन्तर लाभान्वित होते रहेंगे। जहॅां तक मुझे मालूम हो सका है, उत्तर भारत के औदीच्य भाइयों ने प्रारम्भ से ही ब्रह्म्-समाज की कारर्वार्इ में सहयोग दिया है। ऐसी दशा में अपनी सारी शक्ति को गुजराज-काठियावाड पर ही केन्दि्रत कर ७०-८० हजार उत्तर-भारत-वासी औदीच्य जन-समूह को अपनी उपेक्षा का पात्र बनाना कहाँ तक ठीक हो सकता है, इसका निर्णय मैं विज्ञ श्रोताओं पर ही छोडता हँू। आशा है, मेरे इन विचारों से उपस्थित सन सहमत होंगे।अंग्रेजी भाषा में एक आदर्श वाक्य है णपळीूं ळी ीीींशपसींह देववाणी संस्कृत में उसका समभाव-सूचक वाक्य है-'संघे शक्तिः।' भारत के उज्ज्वल अतीत काल में संघ-शक्ति का विशेष महत्व रहा था या नहीं, यह प्रश्न विचारणीय नहीं है किन्तु संसार की वर्तमान गति-विधि को देखते हुए प्रत्येक देश, राष्ट्र, जाति अथवा जन-समूह के लिए यह आदर्श वाक्य एक ध्रुव सत्य बन गया है। यदि कोर्इ जाति इस तथ्य से विमुख रहना चाहती है, तो वर्तमान युग के जीवन-संघर्ष में उसका अस्तित्व ही सन्दिग्ध हो जाता है। यही कारण है कि इस समय प्रत्येक जाति ही नहीं, किन्तु हर तरह के उद्योग-धंधे या पेशेवाले लोग भी अपने सम्बन्ध के विविध प्रश्नों को हल करने के लिए अपने-अपने संघ स्थापित करते जा रहे हैं। यह तो हर्ष का विषय है ही कि अपनी औदीच्य ज्ञाति भी इस बात में औरों से पिछडी हुर्इ नहीं है फिर भी अभी कर्इ-एक प्रश्नों को हल कर ब्रह्म्-समाज को विशेष प्रयत्नपूर्वक अपनी सार्थकता सिद्ध करना है। जिस महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर मैं संकेत करना चाहता हँू, वह है, भिन्न-भिन्न प्रान्तों में बसने वाले औदीच्य ब्राह्म्णों के अवान्तर भेदों को एकीकरण। काठियावाड, गुजरात, राजपूताना, मध्यभारत, युक्त प्रान्त तथा पंजाब आदि प्रान्तों मे जो औदीच्य बन्धु, औदीच्, गोरवाल, रोहडवाल, बावीसे, गोरवाल, टोलकिये आदि अनेक नामों से अपना परिचय देते हैं, उन सबके आचार-व्यवहार की मोटी मोटी बातों की एक बार स्थूल रूप से जाँच-पडताल करके इस जाति के इन सब बिखरे हुए अंगों को एकता के सूत्र में आबद्ध करना, औदीच्य ब्राह्म्ण वर्ग का भविष्य समुज्ज्वल करने में बहुत कुछ सहायक होगा। कहना न होगा कि यदि औदीच्य-ब्रह्म्-समाज ने इस आवश्यक कार्य को अपना ध्येय बनाकर इसकी पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न किया, तो इसके द्वारा औदीच्य ब्राह्म्ण समूह का निस्सन्देह एक ऐसा अनुपम कार्य सम्पन्न होगा, जो इस जाति के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जायगा। वस्तुतः ऐसा करने से जाति के बिखरे हुए टुकडों में नवजीवन का संचार होकर "संघे शक्तिः" के उ आदर्श की यथार्थ रूप में पूर्ति होगी। आज से कोर्इ १०० वर्ष पूर्व भारतवर्ष में रेल, मोटर, तार, डाकखाने, सामयिक पत्र आदि उपयोगी साधन विद्यमान न थे, जिससे भिन्न-भिन्न प्रांतों में रहनेवाले एक ही जाति के लोग एक-दूसरे से पृथक् ही बने रहे और एक प्रांत के औदीच्य-बंधुओं का दूसरे प्रांतवालों से पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित न हो सका परन्तु अब तो परिस्थिति में कायापालट हो गर्इ है। हर एक तरह के गमनागमन और विचार-विनिमय के साधन उपस्थित हो गए हैं, अतः इस प्रश्न को अब हल करना पहले की अपेक्षा कही सुगम हो गया है। इसलिए मुझे आशा है कि ब्रह्म्-समाज के द्वारा यह महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होने में विशेष कठिनार्इ न होगी।एक और आवश्यक समस्या है, जिसका प्रत्येक अन्य जाति के साथ-साथ औदीच्य ब्राह्म्ण समाज के लिए भी विशेष महत्त्व है और जिसे हल करने के लिए ब्रह्म्-समाज का प्रयत्न अपेक्षित है। वह शिक्षा का व्यापक प्रचार। यद्यपि मैं जानता हॅूं कि औदीच्य-ब्रह्म्-समाज की ओर से गुजरात तथा काठियावाड प्रान्तों में कतिपय शिक्षा-सम्बन्धी संस्थाएं, छात्रालय आदि चल रहे हैं, तो भी कहना न होगा कि सारे ज्ञाति-समूह को लक्ष्य में रखते हुए उनकी संख्या बहुत थोडी है। इस कार्य को व्यापक रूप देने के लिए, जैसा पहले कहा जा चुका है, प्रान्त-प्रान्त में ब्रह्म्-समाज की शाखाएँ स्थापित की जायँ और उनके द्वारा शिक्षा-सम्बन्धी कार्य को अग्रसर करने के लिए सब ज्ञाति बन्धुओं के सहयोग से संगठित प्रयत्न आरम्भ होना चाहिए। यदि ऐसा हुआ, तो बहुत सम्भव है कि निकट भविष्य में ब्रह्म्-समाज के द्वारा बहुत कुछ रचनात्मक कार्य सम्पन्न हो सकेगा। स्मृतिकर्ता मनु के कथनानुसार सदा से ब्राह्म्णों का विद्या-दान का अधिकार रहा है (अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्म्णनामकमकल्पयत्), इसलिए विद्या-दान के महत्त्व को ब्रह्म्-समाज की अपेक्षा और कौन अधिक समझ सकता है मैं इस बात का अवश्य अनुभव करता हँू कि शिक्षा का व्यापक कार्यक्रम अमल में लाने में आरम्भ में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पडेगा, परन्तु मेरा विश्वास है कि यदि सहृदयता और सद्भाव को साथ रखते हुए संगठित रूप में कार्य किया जाय, तो कुछ वर्षों में इस आदर्श को पूरा करना सम्भव हो सकेगा।इधर मुझे ज्ञात हुआ है कि पिछले कुछ वर्षों से गुजरात के औदीच्य-समाज में बहुविवाह की प्रथा का प्रचार बढता जा रहा है। एक इतिहासवेत्ता की हैसियत से मैं कह सकता हँू कि राजपूत जाति के लिए, जिसका अतीत बहुत उज्ज्वल रहा है, बहुविवाह की प्रथा घातक सिद्ध हुर्इ है, मैंने राजपूताने के इतिहास में भी इस पर प्रकाश डाला है। बहुविवाह से अपव्यय होने के सिवा गृहकलह उत्पन्न होकर मनुष्यों में विलासिता की ओर प्रवृत्ति बढ जाती है, जिससे वे शनैः-शनैः अवनति-मार्ग के पथिक बनते जाते हैं। यदि हमारे गुजरातवासी औदीच्य-बंधुओं के पास द्रव्य की प्रचुरता है, तो मैं उनसे साग्रह अनुरोध करूंॅगा कि विवाह आदि कार्यों में हाथ खोलकर उसका उपयोग न करते हुए वे शिक्षा के व्यापक एवं रचनात्मक कार्यक्रम के लिए उसका सद्व्यय करें। अस्तु।माननीय बन्धुओं मैं अब लम्बा-चौडा भाषण देकर आपको अधिक समय तक रोकना नहीं चाहता, और न मुझे इस समय यह अभीष्ट है कि हमारे अधिवेशन के सुयोग्य एवं वयोवृद्ध सभापति श्रीयुत चतुर्भुज माणकेश्वर भट्ट महोदय के सुललित भाषण को, जिसमें आपके लिए पर्याप्त विचार-सामग्री प्रस्तुत की जायगी, श्रवण करने से आपको अधिक समय तक वंचित रखॅूं। इसलिए केवल एक बात की ओर कुछ संकेत कर मैं आसन ग्रहण करुंँगा। कुछ समय से-बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से मैं देख रहा हँू कि हिन्दुओं की विभिन्न जातियों में सुधार की एक लहर उठ रही है। प्रत्येक जाति सुधार के नशे में मस्त हो रही है। औदीच्य ब्राह्म्ण-वर्ग को भी इसमें पीछे तो न रहना चाहिए, पर हमें यह न भूल जाना चाहिए कि हम जिस सुधार की ओर प्रवृत्त हों, वह आँखें खोलकर किया जाय, न कि केवल गतानुगतिक वृत्ति से। इसलिए जिन सुधारों की ओर हमारा समुदाय अग्रसर हो, वे अन्ततोगत्वा ज्ञाति-समूह के लिए हितकर सिद्ध होने चाहिए। प्राचीन काल से ही भारत ने संसार को जो एक महत्त्वपूर्ण पाठ पढाया था, वह है-'आचार प्रथमो धर्मः।' यह एक ऐसा मूलमंंत्र है जिसने सहस्त्रों वर्षों से संसार के सम्मुख भारत का मस्तक ऊंॅचा रखा है। हमारे ब्रह्म्-समाज को सुधार की लहर में इस आदर्श को कदापि नहीं ठुकराना चाहिए। हम चाहे जितने अच्छे, सुधारक बनें, पर हमें अपने सदाचार को कदापि तिलांजलि नहीं देना चाहिए। मैं नवयुवकों का ध्यान इस ओर विशेषतः आकृष्ट करना चाहता हँू कि सुधारों की लगन में वे भारतीय आदर्शों को ठुकराकर पश्चिम का अन्धानुकरण न करें। साथ ही मैं यह भी जानता हँू कि जिस किसी सुधार का श्रीगणेश हो, उसमें एकदम त्वरा न होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से सैकडों वर्षों के जमे हुए संस्कारों को एकदम हटाना असंभव नहीं तो अत्यन्त दुष्कर अवश्य है। इसलिए मेरी सम्मति यही है कि लोकमत का आदर करते हुए सुधार-कार्य को समय की आवश्यकता के अनुसार शनैः शनैः अग्रसर करना चाहिए। मैं एक अंगे्रज विद्वान के इस मत का पोषक नहीं हूूंॅ कि एरीीं ळी एरीीं रपव थशीीं ळी थशीीं रपव ींहश ीुंरळप ीहरश्रश्र पशीशी ाशशीं अर्थात् पूर्व पूर्व है और पश्चिम पश्चिम है और दोनों का समागम (अथवा एकीकरण)कदापि नहीं होगा। मेरा तो एक मात्र कथन यही है कि पूर्व और पश्चिम, दोनों की संस्कृति में हमें वस्तुतः उत्कृष्ट-उत्कृष्ट गुणों को ग्रहण कर उनसे अपने जीवन को उन्नतिशील बनाना चाहिए।भाषण समाप्त करने से पूर्व आपसे मेरा यही निवेदन है कि शारीरिक अवस्वथतावश मैं आपके इस अधिवेशन-संबंधी कार्य में विशेष सहयोग नहीं दे सका। यहॅां जो कुछ व्यवस्था हो सकी है, उसका श्रेय स्वागत-समिति को है। उपस्थित सनों से अन्त में मैं यही निवेदन करना चाहता हँू कि चाहे आप मेरे विचारों से सहमत हों या न हों, किन्तु इस अधिवेशन में ज्ञाति-हित-सम्बन्धी जो योजनाएँ उपस्थित की जायँ, अथवा जो प्रस्ताव 'पास' हों, उन्हें आप केवल पत्रगत करके न छोड दें, बल्कि उन्हें अपनी पूर्ण शक्ति से कार्य-रूप में परिणत कर ज्ञाति-गंगा की अधिक-से-अधिक सेवा का पुण्य प्राप्त करें। मेरी अन्तिम प्रार्थना है-सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु।सर्वः सद्बुद्धिमाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु।।

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