राजस्थान की जिला इकाइयों द्वारा महासभा के विचारार्थ सुझाव

२४ जनवरी, २०१५ को राजस्थान प्रदेश की प्रत्येक जिला इकार्इ को परिपत्र प्रेषित कर दिनांक ११ जनवरी २०१५ को उज्जैन में हुर्इ साधारण सभा की कार्यवाही की सूचना देते हुए महासभा के कार्य को राजस्थान में कैसे आगे बढाया जावे, इस हेतु सुझाव व विचार आमंत्रित किये गये थे।
उस पत्र के संदर्भ में जिला इकाइयों ने अपने यहां के महासभा के सदस्यों और कार्यकर्ताओं की बैठक आयोजित कर अपने विचार एवं भविष्य के लिए सुझाव भेजे हैं, जिनका सार इस प्रकार है-
१. दिनांक ११ जनवरी २०१५ को उज्जैन की साधारण सभा के उत्तरार्द्ध में चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो भी हुआ, वह निन्दनीय है, और औदीच्य समाज की गरिमा के अनुकूल नहीं है। महासभा के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ और भविष्य में ऐसा वातावरण नहीं बने, इसका पूर्णतः त्रुटि रहित (र्ॠीश्रश्र झीेेष) प्रयास हो।
२. इस बात का पूरा प्रयास किया जावे कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव सर्वसम्मति से हो। चुनाव प्रक्रिया हालांकि विधि सम्मत है और प्रजातांत्रिक भी है, पर सद्विचारों के अभाव में इससे गुटबाजी, क्षेत्रवाद, आपसी मनमुटाव जैसी स्थिति पैदा हो जाती है, जो किसी भी संगठन को नुकसान पहुंचा सकती है।
३. राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनाव के बजाय चयन प्रकिया से भी बनाया जा सकता है। इस प्रक्रिया से जो भी अध्यक्ष बनेगा वह अपनी विशेष जिम्मेदारी समझेगा और अपनी चयनित टीम के साथ अधिक से अधिक महासभा के कार्यों को ऊँचार्इ प्रदान करेगा, क्योंकि विश्वास से बनार्इ समिति के सम्माननीय सदस्यों के विश्वास पर उसको खरा उतरना पडेेगा। राजस्थान में और विशेषकर उदयपुर में यह प्रयोग काफी सफल रहा है।
४. राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव हेतु जो समिति बने उसमें प्रान्तीय अध्यक्ष, महासचिव के साथ जिला कार्यकारिणी का भी प्रतिनिधित्व हो, इस क्रिया को अपनाने हेतु संविधान में संशोधन की आवश्यकता भी पड सकती है, जो उचित समय पर किया जा सकता है।
५. जो भी महानुभव राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर आसीन हो, उनकी महासभा में अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकार्यता हो, वह प्रान्त, क्षेत्र की सीमा से ऊपर उठकर सभी को साथ लेकर चले। महासभा के अखिल भारतीय स्वरूप को कायम करने की क्षमता हो व महासभा के कार्यों को सेवा, समर्पण एवं त्याग की भावना के साथ उत्तरोत्तर बढाता रहे।
६. राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन हेतु एक प्रक्रिया यह भी हो सकती है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रत्येक प्रदेश से कम से कम पांच या अधिक प्रतिनिधि सदस्य बनाये जावे। ये प्रतिनिधि प्रदेश और जिला इकार्इ के अध्यक्ष, सचिव व कोषाध्यक्ष के साथ मिलकर अध्यक्ष के चुनाव में भाग लेवें। इससे भीड तंत्र एवं गुटबाजी विकसित नहीं होगी ओर चुनाव प्रक्रिया नियंत्रण में रहेगी। इस प्रकार महासभा की त्रि-स्तरीय (केन्द्रीय प्रदेश और जिला स्तरीय) व्यवस्था भी मजबूत होगी। इसके वास्ते भी संविधान में संशोधन आवश्यक होगा।
७. केन्द्रीय कार्यकारिणी में कोर्इ पदग्रहण करने या निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेने हेतु महासभा की सदस्यता प्राप्त करने के बाद एक या दो वर्ष के अनुभव की सीमा निर्धारित हो।
८. केन्द्रीय कार्यालय से यह भी अपेक्षा की गर्इ है कि समय-समय पर विशेषकर मासिक बुलेटिन परिपत्र के माध्यम से महासभा की गतिविधियों, संविधान के महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर व सदस्यता के बारे में प्रदेश व जिला कार्यकारिणी को जानकारी में रखा जावे।
प्रदेश स्तर पर कार्य हेतु भी कुछ सुझाव प्राप्त हुए हैं-
अ-हमें प्रदेश में सदस्य संख्या बढानी है, इसके बढने पर ही हम महासभा में प्रभावी होंगे। साथ ही आर्थिक स्तर पर भी मजबूत होंगे। इस हेतु समय-समय पर सदस्यता अभियान चलाया जावे व प्रत्येक कार्यकारिणी का सदस्य अपने स्तर पर १०-१० साधारण सदस्य एवं एक विशेष संरक्षक व ३ संरक्षक अवश्य बनावें।
ब- हमारे कार्यक्रम में निरन्तरता बनी रहनी चाहिए। यह प्रदेश एवं जिला कार्यकारिणी की मासिक बैठक प्रदेश स्तरीय सम्मेलन, सामूहिक सामाजिक कार्यक्रम (विवाह यज्ञोपवीत, उद्यापन, युवा-युवती, अभिभावक, परिचय सम्मेलन) अखिल भारतीय सम्मेलन ऐसे कार्यक्रम प्रदेश एवं जिलास्तर पर आयोजित करने चाहिए।
स- प्रदेश स्तर पर सकल औदीच्य समाज की निर्देशिका बनाने का प्रयास करना चाहिए।
द- जिला इकार्इ स्तर पर प्रमुख त्यौहार एवं पर्व को मनाना एवं युवा-युवती, बालक-बालिकाओें के लिये खेलकूद व अन्य प्रतियोगिताएं एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम हाथ में लिये जावें।
य- प्रदेश और जिला कार्यकारिणी में हमेशा सम्पर्क बना रहे व सूचनाओं का आदान-प्रदान होता रहे।
उपरोक्त बिन्दुओं पर सकारात्मक सोच के आधार पर ही महासभा का अखिल भारतीय स्वरूप सुरक्षित रह सकता है। माननीय रघुनंदन जी शर्मा अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में महासभा को जिस ऊँचार्इ पर ले गये और ले जाना चाहते हैैं, उसका पूर्ण रूप से सम्मान होना चाहिए। यही सोच राजस्थान प्रदेश का अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के साथ तन-मन-धन से सहयोग का कारण बनेगी। प्रदेश महासभा का न तो क्षेत्र-विशेष से या व्यक्ति विशेष से कोर्इ विरोध है और न ही किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। केवल यही भावना है कि गत ११ जनवरी २०१५ को उज्जैन में आयोजित साधारण सभा में जो भी हुआ, उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो।
-हेमशंकर दीक्षित एवं विनोद चन्द्र व्यास

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