प्रश्नशास्त्र

प्रश्नशास्त्र-महेश श्याम सुन्दर दवे, उदयपुर(ज्योतिष विशारद्-इण्डियन काउन्सिल अॅाफ एस्ट्रोलोजिकल साइंसेस, चेन्नर्इ)आजकल टी.वी. पर ज्योतिषीय भविष्यवाणियों से सम्बन्धित अनेक कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं-जैसे- राशि आधारित फलित, जन्म कुण्डली आधारित फलित एवं प्रश्न आधारित फलित।प्रश्नों पर आधारित कार्यक्रम में जातक कोर्इ प्रश्न करता है व ज्योतिर्विद बिना जातक को जाने, उसके जन्मस्थान, समय व तारीख बिना प्रश्नों का सटीक उत्तर देते हैं। ज्योतिष की यह विद्या प्रश्न शास्त्र कहलाती है।प्रश्न कुण्डली- किसी भी घटना या विचार के उत्पन्न होने के समय की कुण्डली निर्माण करके, उस कुण्डली का अध्ययन कर फलादेश करना प्रश्न कुण्डली का आधार है।

 प्रश्न ही क्यों- ज्योतिषीय भविष्यवाणियों के असफल होने के कर्इ कारण हैं-(१) जन्म कुण्डली का उपलब्ध न होना।(२) वास्तविक जन्म समय का ज्ञान न होना या ज्ञात होने पर उसकी शुद्घता विवादग्रस्त होना।(३) प्राचीन समय में सामाजिक कुरीतियों के कारण कन्या की जन्म कुण्डली बनाने पर प्रतिबन्ध।ज्योतिष एवं प्रश्न - ज्योतिष वेदांग के ६६ अंगों में से एक है। ये हैं-शिक्षा, कल्प, निरूक्त, छंद, व्याकरण एवं ज्योतिष।ज्योतिष के तीन भाग हैं-सिद्धान्त, संहिता एवं होरा।कालान्तर में इस क्षेत्र में हुर्इ प्रगति ने ज्योतिष को छह स्कन्धों में वर्गीकृत किया है-गणित, संहिता, होरा, सकुन, मुहूर्त एवं प्रश्न।अतः किसी भी जातक की जन्म कुण्डली के अभाव में, प्रश्न कुण्डली उचित मार्गदर्शन करती है।जन्मकुण्डली एवं प्रश्न कुण्डली- जन्म कुण्डली का महत्त्व कम नहीं आंका जा सकता जब कोर्इ घटना प्रश्न कुण्डली में प्रत्याशित हो और वह जन्म कुण्डली में भी होने का योग हो तो वह जीवन में निश्चित रुप से घटित होती है। जन्म कुण्डली के समय पर आकाश का मानचित्र है वहीं प्रश्न कुण्डली वर्तमान समय में।प्रश्न कुण्डली का विशिष्ट उपयोग- जहाँ ठीक जन्म कुण्डली उपलब्ध है, वहाँ भी प्रश्नकर्ता की चिताओं, आकस्मिक भविष्य को जानने,आकस्मिक समस्याओं का समाधान करने, चोरी हुर्इ संपत्ति की पुनः प्राप्ति एवं चोर की जानकारी के लिए, लापता व्यक्ति के मामले में, बीमारी के मामले में, शादी की अनुकूलता एवं संभावना के बारे में, सन्तान प्राप्ति के सन्दर्भ में प्रश्न कुण्डली उचित समाधान प्रदान कर सकती है।एक ज्योतिर्विद की विशेषताएँ एवं नियम- बृहत संहिता के अनुसार-(१) ज्योतिर्विद गणित एवं फलित का विद्वान हो, धार्मिक प्रवृत्ति वाला हो, सदाचारी मनोवृत्ति तथा सत्यवादी हो, ज्योतिषविनीत अनुशासित, संयमी एवं र्इश्वरीय सत्ता में विश्वास करने वाला हो। (२) ज्योतिर्विद की कुण्डली में बृहस्पति की द्वितीय भाव में स्थिति अथवा द्वितीयेश से युति, द्टष्टि आदि का सम्बन्ध उसे वाक्सिद्घि तथा सरस्वती कृपा प्रदान करती है। (३)आत्मप्रशंसा से रहित एवं आडम्बरहीन ज्योतिर्विद का फलादेश कभी भी असत्य नहीं होता है। (४) ज्योतिर्विद को पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं होना चाहिए एवं प्रतिकूल योग एवं तिथि को जानकर प्रश्न को टालना नहीं चाहिए।(५) ज्योतिर्विद को वेदमंत्रों में निष्णात होना चाहिए एवं ग्रहादि सभी देवताओं को अपने कार्यों का फल समर्पण करने की भावना रखकर कार्य का प्रारम्भ करना चाहिए।प्रश्न के नियम(१) प्रश्नकुण्डली में प्रश्न ल में उदित राशि प्रश्न का शरीर तथा चन्द्र राशि जातक के मन व इच्छाओं का झुकाव है।(२) किसी भी प्रश्न कुण्डली द्वारा एक से अधिक प्रश्नों का समाधान ऐसे किया जा सकता है।प्रथम प्रश्न- प्रश्न ल सेद्वितीय प्रश्न- चन्द्र ल सेतृतीय प्रश्न- सूर्य ल सेचतुर्थ प्रश्न- बृहस्पति ल सेपंचम प्रश्न- बुध व शुक्र में से जो बलवान हो।षष्ठम प्रश्न- बुध एवं शुक्र में से जो बलहीन हो।(३) प्रश्नकुण्डली अधिकतम एक वर्ष तक प्रभावशाली या विस्तारित की जा सकती है।(४) प्रश्न ल प्रश्नकर्ता को दर्शाता है तथा सप्तम भाव प्रश्नकर्त्ता का प्रतिपक्षी है।(५) प्रश्न ल में किसी शुभ ग्रह का होना अच्छा एवं अशुभ ग्रह को अच्छा नहीं माना गया है।(६) विवाद, मुकदमे इत्यादि में प्रश्न ल में एक अशुभ ग्रह का होना अच्छे फल प्रदान करता है।(७) प्रश्न शास्त्र में पाराशरीय सिद्घान्तों के अलावा ताजिक योगों का देखा जाना तर्क सम्मत है अर्थात ताजिक योगों द्वारा प्रश्न की सटीकता से विवेचना की जा सकती है।प्रश्न कुण्डली में कपट-(१) प्रश्न ल में चन्द्रमा हो, शनि केन्द्र में हो तथा कुछ अस्त हो तो प्रश्न कुण्डली में कपट दिखार्इ देता है।(२) प्रश्न ल में चन्द्रमा हो जो बुध व मंगल से द्टष्ट हो तो प्रश्नकर्त्ता छल या दुष्ट भावना से आया है।(३) सप्तमेष किसी भी शुभ प्रभाव से रहित हो तथा कुछ सप्तमेष के शत्रु से द्टष्ट हो तो प्रश्नकर्त्ता की कुण्ठित मनोवृत्ति को दर्शाता है।(४) प्रश्न ल में अशुभ ग्रह का होना प्रश्नकर्त्ता के विनोद या कपट को दर्शाता है।उपरोक्त सारी स्थितियों में ज्योतिर्विद को चाहिए कि ऐसे प्रश्न का कोर्इ समाधान न दें एवं प्रश्नकर्त्ता को अन्य किसी दिन बुलावें।प्रश्नकर्त्ता के नियम -(१) प्रश्नकर्त्ता को अपने र्इश्वर, इष्ट देवता अथवा स्थान देवता को प्रणाम करने के बाद ज्योतिर्विद के पास जाकर प्रातःकाल के समय पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर ज्योतिर्विद से प्रश्न करना चाहिए। ज्योतिर्विद के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाकर श्रीफल, पुष्पमाला, ॠतुफल इत्यादि भेंट कर प्रश्न करना चाहिए।

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