धरती आँसुडा ढलकावे (सप्तपदी)

-डॅा. नन्दकिशोर शर्मा, झालरापाटन (राजस्थान)
इण धरती री गोद मखमली
बैठ बालपण झूमे,
खेल खिलाडी बालपणाँ माँ
बण खेल सूरमा छा जावे।
स्वर्ण पदक जीत घर आवे.
जद खेलवीर कहलावे।
धरती फूली नहीं समावे।।१।।
इण धरती रो बालकडो जद्
पढ लिख नाम कमावे
विद्वानाँ वैज्ञानिक माँहे,
सूरज बण चिलकावे।
जसल्यो धरती ने मल जावे।
जद् विज्ञान वीर कहलावे।।
धरती फूली नहीं समावे।।२।।
इण धरती रो नानकडो जद
बडो संत बण जावे।
ज्ञान सुधा सुँ धरती सींचे
सत्य राह दिखलावे
ज्योति से ज्योत जला जग उजले
अज्ञान तिमिर नसावे
सोया देवत्व जगावे
वो जद सत्यवीर कहलावे।
धरती फूली नहीं समावे।।३।।
इण धरती रो पूत तपस्वी,
धान घणो उपजावे
नाज घणो उपजावे
पाले पोसे सकल जीव जग
माँ ने चूँदड हरी ओढावे
साँचो सेवक गौमाता रो
खरो कमावे खोटो खावे।
कमल पत्र बण जावे
जद यूँ कर्मवीर कहलावे
धरती फूली नहीं समावे।।४।।
इण धरती रो टाबरियो जद
सद् गृहस्थ बण जावे
माता पिता गुरु परिजन सेवा।
पंच यजन सुख पावे।
धनछोडे पे धरम न छोडे
आधार आश्रमाँ बण जावे।
परहित धरम श्रेष्ठतम माने
पर पीडा अपनावे
यूँ धमवीर कहलावे।
धरती फूली नहीं समावे।।५।।
इण धरती रो पूत एक जद
बिगड धूल बण जावे।
बिरखा गौमाता कटवाये
पाप दोस एक ना छोडे
पापी असुर कहावे।
छीन चैन सुख शांति धरा री
खुद रे कालो दाग लगावे
छुरा भोंक पीठ में माँ री
हद से बात गुजर जावे
रहूँ बाँझडी अस्या पूत जण
मायड पूत जडज पछतावे।
जमीं पगांरी खसकी जावे
बोले-दूध लजायो बाला,
धरती अछतावे पछतावे
धरती आँसुडा ढलकावे।।६।।
इण धरती रो खून रगाँ माँ
जद माँ ने दुःखी देख उबलावे।
जद रणभेरी काना में गूँजे
रोग भूल बूढापण बिसरे
पड्यो खाटले उठ भागे।
पागल ज्यूँ रण में जा जूझे
बैरयौ रा छक्का जा छूटे
सीस आपणो कटा समर माँ
यूँ माँ री लाज बचा जावे
माटी रो करज चुका जावे।
बोले-दूध उजाल्यो बाला,
फेरूँ बावड करवाँ माटे,
छाती टूक टूक वेजावे
म्हारो हिवडो भर भर आवे
म्हारा आँसूना रुक पावे।
धरती आँसूडा ढलकावे,
माँयड आँसूडा ढलकावे।।७।।
धरती आँसुडा ढलकावे।।

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