पापा जब बच्चे थे -६ पापा ने संगीत सीखा

पापा जब छोटे थे, तो उनके माता-पिता उन्हें तरह-तरह के खिलौने खरीदकर देते थे-गेंद, लोटो, लूडो, मोटर-सभी कुछ। और फिर अचानक उन्होंने एक पिआनो खरीदा। लेकिन यह कोर्इ खिलौना नहीं था। यह सचमुच का बडा सुंदर पिआनो था। उसका ढक्कन चटकदार काले रंग का था। वह इतना बडा था कि आधे कमरे को घेर लेता था।
पापा ने दादा से पूछा ः
"तुम्हें पिआनो बजाना आता है"
"न, नहीं," दादा बोले।
पापा ने दादी से पूछा ः
"तुम्हें, पिआनो बजाना आता है"
"न," दादी ने कहा।
"तो पिआनो बजायेगा कौन" पापा ने पूछा।
दादा और दादी ने एक आवाज में कहा ः
"तुम"
"मगर मुझे भी तो नहीं आता।"
"तुम्हें सिखाया जायेगा," दादा ने कहा। दादी ने बात को पूरा किया ः
"तुम्हें सिखाने के लिए एक मास्टरनीजी आयेंगी।"
अचानक पापा ने महसूस किया कि उन्हें एक अद्भुत उपहार दिया गया है। घर पर आज तक कोर्इ मास्टर नहीं आया था। पापा ने अपने सभी नये खिलौनों के साथ खेलना अपने-आप सीखा था।
फिर संगीत-शिक्षिका आर्इं। वह हल्की आवाज में बोलनेवाली बुजुर्ग महिला थी। उन्होंने पापा को पिआनो बजाकर सुनाया। फिर उन्होंने पापा को स्वर सिखाना शुरू किया। स्वर कुल सात थे-सा, रे, ग, म, प, ध, नी। पापा ने उन्हें बडी जल्दी सीख लिया, क्योंकि उन्होंने अपनी वर्णमाला की किताब में वर्णों के चित्रों की तरह स्वरों के भी चित्र बना लिये थे। उन्होंने कहा : 'स' से सवार और सवार का चित्र बना लिया। 'र' से रेलगाडी, और उन्होंने रेलगाडी बना दी। 'ग' के लिए उन्होंने गमला, 'म' के लिए मटका, 'प' के लिए पतंग, 'ध' के लिए धनुष और 'नी' के लिए नीकर की तसवीरें बना लीं। पापा बहुत खुश थे। मगर जल्दी ही उन्होंने अनुभव किया कि पिआनो बजाना सीखना इतना आसान नहीं है। एक ही चीज को बार-बार बजाने से वह ऊब गये। फिर पढना, खेलना या कुछ भी न करना कहीं ज्यादा मजेदार लगता था। कोर्इ दो हफ्ते के भीतर पापा संगीत की शिक्षा से इतने ऊब गये और तंग आ गये कि पिआनो देखना भी उन्हें न सुहाता। मास्टरनीजी, जो आरंभ में पापा से बहुत खुश थी, अब दुःख से अपना सिर हिलाने लगी।
"तुम्हें सीखना अच्छा नहीं लगता" उन्होंने पापा से पूछा।
"न," पापा ने कहा। हर बार जब वह यह कहते, तो वह सोचते थे कि टीचर नाराज हो जायेंगी और उन्हें सिखाना बंद कर देंगी। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
दादा और दादी ने पापा को डांटा।
"देखो, हमने तुम्हारे लिए कैसा सुंदर पिआनो खरीदा है," उन्होंने कहा। "तुम्हें सिखाने के लिए मास्टरनी आती है..... तुम सीखना नहीं चाहते शर्म आनी चाहिए तुम्हें"
और दादा बोले ः
"अब यह संगीत नहीं सीखना चाहता। इसके बाद यह स्कूल न जाना चाहेगा। फिर यह कहेगा कि काम करने में कुछ नहीं रखा है। इस जैसे काहिल छोकरों को बचपन में ही यह सिखाना चाहिए कि काम कैसे किया जाता है। तुम्हें पिआनो बजाना सीखना ही होगा"
दादी ने कहा ः
"अगर मुझे बचपन में संगीत सिखाया गया होता, तो मैं तो उलटे अहसान मानती।"
"जी, बहुत शुक्रिया " पापा ने कहा, "मगर मुझे नहीं सीखना संगीत"
और अगले दिन जब टीचर घर आर्इं, तो पापा गायब हो गये। सारे घर में और बाहर गली में उनकी तलाश की गर्इ, मगर वह कहीं भी नहीं मिले। जैसे ही संगीत की शिक्षा का समय खत्म होने को आया, पापा पलंग के नीचे से निकल आये और बोले ः
"नमस्ते, टीचरजी"
इस पर दादा ने कहा ः
"इस बार तुम पछताओगे"
और दादी ने अपनी बात जोडी :
"जब तुम इससे निपट लोगे, तो मैं इसे अलग सजा दँूगी।"
इस पर पापा बोले : "अगर मुझे संगीत न सीखना पडे, तो मुझे इस बात की कोर्इ परवाह नहीं कि तुम क्या करोगे"
और इसके बाद वह रोने लगे। आखिर, वह अभी भी बहुत छोटे थे। उन्हें संगीत सीखने से बहुत चिढ थी, इसलिए संगीत-शिक्षिका ने कहा ः
"संगीत से लोगों को आनंद मिलना चाहिए। मेरा कोर्इ भी शिष्य मुझसे बचने के लिए पलंग के नीचे नहीं छिपता। अगर कोर्इ बा घंटे भर पलंग के नीचे पडा रहना पसंद करता है, तो इसका मतलब है कि वह संगीत नहीं सीखना चाहता। और अगर ऐसी ही बात है, तो उस पर जबरदस्ती करने का कोर्इ फायदा नहीं। बडा होने पर वह शायद इसके लिए पछताये। मैं इससे विदा ले लूंगी और उन बों के पास चली जाऊंगी, जो मुझसे बचकर पलंगो के नीचे नहीं जा छिपते।"
इस तरह वह चली गर्इ और फिर कभी नहीं आयी। फिर भी, दादा ने तो पापा को सजा दी ही। और जब पापा उनसे छूटकर आये, तो दादी ने भी उन्हें सजा दी। इसके बाद अरसे तक जब भी पापा पिआनो के पास से गुजरते, तो उनके चेहरे का रंग बदल जाता था।
जब पापा बडे हुए, तो उन्हें पता चला कि उन्हें संगीत की जरा भी समझ नहीं है। अभी भी वह किसी भी गाने को ठीक से नहीं गा सकते थे और बिढया पिआनो बजाना तो वह, बेशक, कभी भी नहीं सीख सकते थे।
खैर, बात शायद यही हो कि सभी बों के लिए पिआनो बजाना सीखना जरूरी नहीं है।

Search