पत्र सम्पादक के नाम

महोदय,
लोकार्पण व सम्मान समारोह के आयोजनों में आयोजक या पदाधिकारी अपने रिश्तेदारो (दामाद, साले, समधी, जीजा, मामा, फूफा, साढू आदि) को मंचासीन तथा सम्मानित करते हुए पुनरावृत्ति करते हैं। सामाजिक धन से अपने रिश्तेदारों को बार-बार आतिथ्य देकर या सम्मानित कर ये क्या सिद्ध करना चाहते हैं कि समाज में प्रतिभावान, दानशील, कुशल वक्ता व सहयोगियों की कमी है या चुनिंदा लोग ही इसके पात्र हैं। अस्तु स्वजन, परिजन व रिश्तेदारों के साथ अन्य सामाजिक लोगों को जोडना होगा। वस्तुतः ऐसे आयोजन या कार्यक्रम सामाजिकजनों के उत्साहवर्द्धन व छवि बढाने हेतु किए जाते हैं। आतिथ्य व सम्मानित होने वालों की पुनरावृत्ति होने से समारोह का दायरा सीमित तथा निजी होकर समारोह की गरिमा कम ही करता है। धनवान, सत्ताधीश, राजनेता व जनप्रतिनिधि के अतिरिक्त कृषक, व्यापारी, संत, पंडित, कवि,विद्यार्थी व विद्वत्जनों में भी समाज सेवा की भावनाएँ हैं तथा वे आतिथ्य व सम्मान के पात्र हैं। बस जरूरत है इन्हें पहचानते और आमंत्रित करने की।
-प्रो.बी.एल.शर्मा, तराना

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